झारखंड

झारखंड में नदियों को प्रदूषित करना पड़ेगा महंगा, एक साल की जेल और पांच लाख तक जुर्माने का प्रस्ताव

Kavita2
22 Oct 2026 10:06 AM IST
झारखंड में नदियों को प्रदूषित करना पड़ेगा महंगा, एक साल की जेल और पांच लाख तक जुर्माने का प्रस्ताव
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रांची। झारखंड में नदियों और उनके आसपास के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को प्रदूषण, अवैध गतिविधियों और अनियंत्रित निर्माण से बचाने के लिए राज्य सरकार सख्त कानूनी व्यवस्था बनाने की तैयारी कर रही है। जल संसाधन विभाग ने इसके लिए ‘द झारखंड फ्लड प्लेन जोनिंग एक्ट-2026’ का प्रारूप तैयार किया है। प्रस्तावित कानून के तहत नदियों और बाढ़ के मैदानों में खतरनाक, जहरीला, बायोमेडिकल या औद्योगिक कचरा डालने, नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा उत्पन्न करने और बाढ़ से सुरक्षा के लिए बनाए गए ढांचों के साथ छेड़छाड़ करने पर एक वर्ष तक की जेल या दो से पांच लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

जल संसाधन विभाग ने इस प्रस्तावित कानून का प्रारूप सार्वजनिक करते हुए आम नागरिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और संबंधित पक्षों से सुझाव मांगे हैं। सुझावों पर विचार करने के बाद मसौदे में आवश्यक संशोधन किए जा सकते हैं। फिलहाल यह प्रस्तावित कानून है और इसे लागू करने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

नदियों और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की सुरक्षा पर जोर

झारखंड में कई नदियां राज्य की जल व्यवस्था, कृषि, पर्यावरण और लोगों की आजीविका के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन नदियों के आसपास स्थित क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण, अतिक्रमण और कचरे का निस्तारण पर्यावरण के साथ-साथ बाढ़ प्रबंधन के लिए भी चुनौती बन सकता है।

प्रस्तावित कानून का उद्देश्य ऐसे क्षेत्रों में गतिविधियों को नियंत्रित करना और नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को सुरक्षित रखना है। बाढ़ के दौरान नदी का पानी आसपास के मैदानी इलाकों में फैलता है। ये क्षेत्र अतिरिक्त पानी को समाहित करने और बाढ़ के दबाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

यदि इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निर्माण, मिट्टी भराई या अन्य बाधाएं खड़ी कर दी जाती हैं, तो पानी के प्राकृतिक बहाव में रुकावट पैदा हो सकती है। इससे आसपास की आबादी और कृषि भूमि को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है।

खतरनाक कचरा डालने पर सख्त सजा का प्रस्ताव

नए कानून के प्रारूप में नदी और बाढ़ के मैदानों में प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों पर विशेष ध्यान दिया गया है। खतरनाक रासायनिक पदार्थ, जहरीला कचरा, अस्पतालों से निकलने वाला बायोमेडिकल कचरा और औद्योगिक अपशिष्ट नदियों के पानी की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

ऐसे पदार्थ जलजीवों, पशुओं और मानव स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदायक हो सकते हैं। नदी के पानी का उपयोग सिंचाई और अन्य आवश्यकताओं के लिए किया जाता है। ऐसे में प्रदूषण का असर आसपास रहने वाले लोगों तक पहुंच सकता है।

प्रारूप के अनुसार, प्रतिबंधित गतिविधियों में संलिप्त पाए जाने पर एक वर्ष तक के कारावास या दो से पांच लाख रुपये तक के आर्थिक दंड का प्रावधान प्रस्तावित है। हालांकि, अलग-अलग उल्लंघनों के लिए दंड की सटीक शर्तें अंतिम अधिनियम के प्रावधानों पर निर्भर करेंगी।

नदी का प्राकृतिक प्रवाह रोकना भी गंभीर मामला

प्रस्तावित कानून में नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित करने वाली गतिविधियों को भी गंभीरता से लिया गया है। नदी में अवरोध पैदा करने, उसके बहाव को प्रभावित करने या बाढ़ के पानी के निकलने के रास्तों को अवरुद्ध करने से कई क्षेत्रों में जलभराव और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।

नदियों के आसपास होने वाले अनियोजित विकास के कारण कई बार पानी के प्राकृतिक निकासी मार्ग संकरे हो जाते हैं। भारी बारिश के दौरान ऐसी परिस्थितियां गंभीर समस्या पैदा कर सकती हैं।

इसी को देखते हुए फ्लड प्लेन जोनिंग की व्यवस्था महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसके जरिए बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्रों की पहचान की जाती है और जोखिम के आधार पर भूमि उपयोग को नियंत्रित करने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है।

बाढ़-सुरक्षा ढांचों से छेड़छाड़ पर भी कार्रवाई

प्रस्तावित कानून में बाढ़ से बचाव के लिए बनाए गए सुरक्षात्मक ढांचों को नुकसान पहुंचाने या उनके साथ छेड़छाड़ करने जैसी गतिविधियों को भी शामिल किया गया है।

तटबंध, जल निकासी संरचनाएं और अन्य बाढ़ नियंत्रण व्यवस्थाएं आबादी तथा कृषि क्षेत्रों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन ढांचों को नुकसान पहुंचने से आपदा के समय बड़े स्तर पर परेशानी खड़ी हो सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, बाढ़ नियंत्रण के लिए केवल नए निर्माण करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मौजूदा व्यवस्थाओं की सुरक्षा और नियमित रखरखाव भी आवश्यक है।

गंगा के बाढ़ क्षेत्रों के प्रबंधन पर भी काम

झारखंड सरकार पहले से ही गंगा नदी के आसपास बाढ़ क्षेत्र निर्धारण और भूमि उपयोग प्रबंधन की दिशा में पहल कर रही है। जल संसाधन विभाग ने जुलाई 2026 में गंगा नदी के लिए फ्लड प्लेन जोनिंग, भूमि उपयोग नियमन और टिकाऊ बाढ़ जोखिम प्रबंधन संबंधी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार कराने के लिए परामर्शदाताओं से प्रस्ताव मांगे थे।

राज्य की जल नीति में भी आवश्यकतानुसार बाढ़ क्षेत्र निर्धारण और अन्य उपायों के जरिए कृषि भूमि तथा नदी तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा पर जोर दिया गया है।

आम लोगों के सुझावों को मिलेगा महत्व

जल संसाधन विभाग द्वारा मसौदा सार्वजनिक किए जाने का उद्देश्य प्रस्तावित कानून पर विभिन्न पक्षों की राय प्राप्त करना है। नदी किनारे रहने वाले नागरिकों, किसानों, औद्योगिक इकाइयों, सामाजिक संगठनों और पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञों के सुझाव इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

कानून तैयार करते समय पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय लोगों की आजीविका, कृषि गतिविधियों और भूमि उपयोग से जुड़े मुद्दों के बीच संतुलन स्थापित करना भी जरूरी होगा।

विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों में, जहां लोग लंबे समय से नदी किनारे रह रहे हैं या खेती कर रहे हैं, प्रस्तावित नियमों के व्यावहारिक प्रभावों पर विचार करना आवश्यक होगा।

बाढ़ प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

देश में बाढ़ के जोखिम को कम करने के लिए फ्लड प्लेन जोनिंग को महत्वपूर्ण गैर-संरचनात्मक उपाय माना जाता है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय भी राज्यों को इस व्यवस्था को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता रहा है। अगस्त 2025 में इस संबंध में तकनीकी दिशानिर्देश राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को उपलब्ध कराए गए थे।

झारखंड में प्रस्तावित कानून को अंतिम मंजूरी मिलने और प्रभावी ढंग से लागू किए जाने पर नदियों के संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करने की दिशा में मदद मिल सकती है।

फिलहाल सभी की निगाहें जल संसाधन विभाग द्वारा प्राप्त सुझावों की समीक्षा और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हैं। प्रस्तावित व्यवस्था से स्पष्ट संकेत मिलता है कि राज्य में नदियों के प्राकृतिक प्रवाह और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की सुरक्षा को अधिक प्राथमिकता देने की तैयारी की जा रही है।

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