
जमशेदपुर। झारखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली की तस्वीर एक बार फिर सामने आई है। राज्य के बड़े जिलों में शामिल जमशेदपुर में लाखों की आबादी के लिए सरकारी स्वास्थ्य परिवहन व्यवस्था बेहद सीमित नजर आ रही है। जिले की करीब 27 लाख आबादी के लिए सरकारी स्तर पर मात्र 25 एंबुलेंस उपलब्ध हैं। इनमें भी आपातकालीन सेवा के लिए संचालित 108 एंबुलेंस की संख्या केवल 16 है, जो मरीजों की बढ़ती जरूरतों के मुकाबले काफी कम मानी जा रही है।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जिले में प्रसव से जुड़ी सेवाओं के लिए अलग से 94 ममता वाहन उपलब्ध हैं। इन वाहनों का मुख्य उद्देश्य गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक पहुंचाना है। हालांकि, सामान्य मरीजों और गंभीर आपात स्थिति में एंबुलेंस की उपलब्धता अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है। कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में एंबुलेंस तो उपलब्ध हैं, लेकिन इनका उपयोग सीमित दायरे में ही हो रहा है। कई जगहों पर एंबुलेंस का काम सिर्फ मरीजों को सीएचसी से जमशेदपुर स्थित एमजीएम अस्पताल या सदर अस्पताल तक पहुंचाने तक सिमट गया है। गंभीर मरीजों को समय पर बेहतर इलाज के लिए रेफर करने की स्थिति में भी संसाधनों की कमी सामने आती है।
आपातकालीन सेवाओं पर बढ़ता दबाव
जमशेदपुर जैसे औद्योगिक जिले में सड़क दुर्घटनाओं, गंभीर बीमारियों और अन्य आपात स्थितियों के मामले लगातार सामने आते रहते हैं। ऐसे में सीमित संख्या में एंबुलेंस होने से मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने में परेशानी होती है। कई बार मरीजों के परिजनों को निजी एंबुलेंस का सहारा लेना पड़ता है, जिससे आर्थिक बोझ भी बढ़ जाता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए अस्पतालों में डॉक्टर और दवाओं के साथ-साथ मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। एंबुलेंस सेवा कमजोर होने से इलाज की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
ग्रामीण इलाकों में सबसे ज्यादा परेशानी
जिले के दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई गांवों से स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचने में लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। अगर वहां से मरीज को बड़े अस्पताल में रेफर किया जाता है तो एंबुलेंस मिलने में देरी हो सकती है।
विशेषकर गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों के लिए समय पर परिवहन सुविधा जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर साबित हो सकती है। हालांकि ममता वाहन योजना से प्रसव सेवाओं में कुछ राहत मिली है, लेकिन अन्य आपात जरूरतों के लिए पर्याप्त एंबुलेंस की कमी बनी हुई है।
अस्पतालों में संसाधनों की कमी भी बड़ी समस्या
झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था में केवल एंबुलेंस की कमी ही नहीं, बल्कि अस्पतालों में डॉक्टरों, विशेषज्ञ चिकित्सकों, जांच सुविधाओं और अन्य संसाधनों की कमी भी लंबे समय से चिंता का विषय रही है। बड़े अस्पतालों पर मरीजों का दबाव लगातार बढ़ रहा है, जबकि स्वास्थ्य केंद्रों में सुविधाओं का विस्तार अपेक्षित गति से नहीं हो पाया है।
एमजीएम अस्पताल और सदर अस्पताल जैसे प्रमुख संस्थानों में आसपास के कई जिलों से मरीज पहुंचते हैं। ऐसे में सीमित संसाधनों पर मरीजों का बोझ बढ़ जाता है।
व्यवस्था सुधारने की जरूरत
स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए एंबुलेंस की संख्या बढ़ाने, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करने और रेफरल सिस्टम को प्रभावी बनाने की जरूरत है। विशेषज्ञों के अनुसार, केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मरीजों को समय पर इलाज तक पहुंचाने की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी।
जमशेदपुर में 27 लाख आबादी के लिए उपलब्ध एंबुलेंस की संख्या स्वास्थ्य व्यवस्था की मौजूदा चुनौतियों को दिखाती है। राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में मरीजों को समय पर और आसानी से स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकें।
झारखंड में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। एंबुलेंस की कमी, अस्पतालों पर बढ़ता दबाव और ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित सुविधाएं यह संकेत देती हैं कि स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़े स्तर पर सुधार की आवश्यकता है।





