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आदिवासी समाज ने खोई मुखर आवाज
रांची: झारखंड की युवा आदिवासी नेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता निशा कुमारी भगत के निधन से गुमला और रांची समेत आदिवासी समाज में शोक की लहर है। शुक्रवार, 6 नवंबर को रांची के पिठौरिया थाना क्षेत्र में उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। शुरुआती रिपोर्टों में आत्महत्या की बात सामने आई है। पुलिस घटना की परिस्थितियों की जांच कर रही है। निशा भगत ने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई और बेंगलुरु में नौकरी करने के बाद आदिवासी समाज के अधिकारों और संस्कृति के संरक्षण के लिए काम करने का रास्ता चुना था।
निशा भगत मूल रूप से गुमला जिले के बड़ाईक मोहल्ले की रहने वाली थीं। उनके पिता हांदू भगत झारखंड आंदोलन से जुड़े रहे थे। बचपन से ही उन्होंने अपने परिवार को सामाजिक संघर्षों से गुजरते देखा था। पिता के आंदोलनकारी विचारों का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। यही कारण था कि उन्होंने आगे चलकर आदिवासी समाज के मुद्दों को अपनी सार्वजनिक गतिविधियों का प्रमुख हिस्सा बनाया। निशा ने शुरुआती शिक्षा गुमला में पूरी की। इसके बाद दुर्गापुर के डीएसएमएस संस्थान से होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की और बेंगलुरु में नौकरी शुरू की। उन्होंने मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई भी की थी। हालांकि, कुछ समय बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर अपने गृह क्षेत्र में सामाजिक कार्यों से जुड़ने का फैसला किया। आदिवासी अस्मिता, सरना धर्म कोड, जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा और पारंपरिक संस्कृति के संरक्षण जैसे मुद्दे निशा भगत की सक्रियता के केंद्र में रहे। वह सीएनटी-एसपीटी एक्ट की रक्षा और पेसा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग भी उठाती थीं। उनका मानना था कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति, परंपराओं और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी हुई है।
निशा भगत धर्मांतरण और डीलिस्टिंग जैसे विवादित मुद्दों पर भी मुखर थीं। दिसंबर 2025 में उन्होंने इन मुद्दों को लेकर सिर मुंडवाकर विरोध दर्ज कराया था। वह धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को अनुसूचित जनजाति आरक्षण का लाभ दिए जाने का विरोध करती थीं। उनके इन विचारों को लेकर सार्वजनिक बहस भी होती रही। सामाजिक आंदोलनों के साथ निशा भगत ने राजनीति में भी कदम रखा। वर्ष 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में उन्होंने झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) के टिकट पर गुमला विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। सितंबर 2025 में उन्हें केंद्रीय सरना समिति की केंद्रीय महिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी मिली थी।
निशा भगत अपनी मातृभाषा कुड़ुख और आदिवासी परंपराओं के संरक्षण पर विशेष जोर देती थीं। वह महिलाओं और युवाओं को सामाजिक गतिविधियों से जोड़ने के लिए भी सक्रिय रहीं। सार्वजनिक मंचों पर उनका बेबाक अंदाज उनकी पहचान बन गया था। उनकी मौत से पहले सोशल मीडिया पर करीब दस मिनट का फेसबुक लाइव वीडियो सामने आया था। इसमें उन्होंने अपनी परेशानियों और सामाजिक संघर्षों का उल्लेख किया था। पुलिस वीडियो सहित अन्य परिस्थितियों की जांच कर रही है। उनकी मौत का सटीक कारण और उससे जुड़ी परिस्थितियां जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगी। निशा भगत के असामयिक निधन ने आदिवासी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को शोक में डुबो दिया है। होटल मैनेजमेंट से शुरू हुआ उनका पेशेवर सफर आदिवासी अधिकारों के संघर्ष तक पहुंचा। सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में उनकी सक्रियता के कारण उन्हें आदिवासी अस्मिता की मुखर आवाज के रूप में याद किया जा रहा है।
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