
x
मादा की तलाश में आए छह बाघ लौटे
रांची: झारखंड के जंगलों में बाघों की आवाजाही के बावजूद उनका स्थायी ठिकाना नहीं बन पाना संरक्षण से जुड़ी चिंता बना हुआ है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में दूसरे वन क्षेत्रों से करीब छह नर बाघ राज्य में पहुंचे। अलग-अलग इलाकों में तीन महीने से लेकर लगभग एक साल तक उनकी मौजूदगी रही, लेकिन वे यहां स्थायी रूप से नहीं बसे। वन्यजीव विशेषज्ञ मादा बाघिनों की कमी को इसकी एक प्रमुख वजह मान रहे हैं।
बाघों के व्यवहार का अध्ययन करने वाले शमशाद आलम के मुताबिक, पड़ोसी राज्यों में नर बाघों के बीच क्षेत्र को लेकर प्रतिस्पर्धा उनके नए इलाकों तक पहुंचने का कारण बनती है। झारखंड आने वाले नर बाघों को यहां प्रजनन के लिए मादा नहीं मिलने से उनके टिकने की संभावना प्रभावित हो रही है। हालांकि, प्रत्येक बाघ के लौटने का कारण समझने के लिए उसकी आवाजाही और संबंधित परिस्थितियों का अध्ययन जरूरी है।
बाघों के प्राकृतिक व्यवहार पर हुए वैज्ञानिक शोध में भी नर और मादा की आवाजाही में अंतर पाया गया है। नर बाघ अपने जन्म वाले क्षेत्र से दूर जाकर नया इलाका तलाश सकते हैं, जबकि मादाओं में परिचित क्षेत्र के आसपास बसने की प्रवृत्ति अधिक देखी गई है। इससे किसी नए वन क्षेत्र तक नर बाघों का पहुंचना और वहां प्रजनन करने वाली आबादी का बसना दो अलग स्थितियां हो सकती हैं।
रणथंभौर की एक छोटी, अपेक्षाकृत अलग-थलग बाघ आबादी पर हुए अध्ययन में भी अधिकांश युवा मादाओं ने अपने जन्म वाले क्षेत्र के करीब इलाका स्थापित किया था। कुछ मादाएं दूर भी गईं। यह बताता है कि बाघिनों का नए क्षेत्रों तक पहुंचना संभव है, लेकिन उनकी आवाजाही का स्वरूप नर बाघों जैसा होना जरूरी नहीं है। इस अध्ययन के निष्कर्ष झारखंड के छह बाघों की गतिविधियों का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं हैं, बल्कि उनके व्यवहार को समझने की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि देते हैं।
बाघ सामान्यतः अकेले रहने वाला और अपना क्षेत्र निर्धारित करने वाला वन्यजीव है। इसलिए मादा की जरूरत का अर्थ स्थायी जोड़े में साथ रहना नहीं है। नर के क्षेत्र निर्धारण में प्रजनन के अवसर महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि मादा के लिए भोजन और अन्य संसाधनों की उपलब्धता की बड़ी भूमिका रहती है। स्थायी आबादी के लिए इन दोनों आवश्यकताओं का पूरा होना अहम है।
वन क्षेत्र की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पानी, पर्याप्त वन आवरण और शिकार की उपलब्धता मादा बाघों के क्षेत्र तथा उनकी प्रजनन सफलता को प्रभावित कर सकती है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि बाघों की आवाजाही अलग-अलग आबादियों के बीच आनुवंशिक आदान-प्रदान में भी भूमिका निभाती है। ऐसे में झारखंड के जंगलों तक पहुंचे बाघों का संरक्षण महत्व है, भले ही उनकी मौजूदगी फिलहाल स्थायी आबादी में न बदली हो।
Next Story





