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सहकारिता को मिलेगी नई दिशा, झारखंड में मजबूत नीति तैयार करने की कवायद तेज
Ranchi: झारखंड सरकार सहकारिता क्षेत्र को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। राज्य में नई सहकारिता नीति तैयार की जाएगी, जिसका उद्देश्य किसानों, स्वयं सहायता समूहों, दुग्ध उत्पादकों, महिला समूहों और ग्रामीण उद्यमियों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। सरकार का मानना है कि मजबूत सहकारिता व्यवस्था से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी और रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
नई नीति के माध्यम से सहकारी समितियों के संचालन में सुधार, तकनीक का बेहतर उपयोग, वित्तीय पारदर्शिता और बाजार तक आसान पहुंच सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया जाएगा। सरकार का लक्ष्य है कि सहकारिता आंदोलन को राज्य के विकास का महत्वपूर्ण आधार बनाया जाए।
नई सहकारिता नीति की तैयारी
सरकार के अनुसार, प्रस्तावित नीति में वर्तमान व्यवस्था की चुनौतियों का अध्ययन कर व्यावहारिक समाधान शामिल किए जाएंगे। सहकारी समितियों को अधिक सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने के लिए विशेषज्ञों, विभागीय अधिकारियों और संबंधित हितधारकों से सुझाव लिए जा रहे हैं।
नीति में ऐसे प्रावधान शामिल किए जाने की संभावना है, जिससे सहकारी संस्थाएं बदलती आर्थिक जरूरतों के अनुरूप बेहतर ढंग से कार्य कर सकें।
किसानों को मिलेगा सीधा लाभ
नई नीति का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिलने की उम्मीद है। इसके तहत—
कृषि उत्पादों के बेहतर विपणन की व्यवस्था।
उर्वरक, बीज और कृषि उपकरणों की उपलब्धता में सुधार।
भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाओं का विस्तार।
सहकारी समितियों के माध्यम से वित्तीय सेवाओं तक आसान पहुंच।
कृषि आधारित उद्यमों को प्रोत्साहन।
इन कदमों से किसानों की आय बढ़ाने और कृषि क्षेत्र को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद मिल सकती है।
महिला स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा
सरकार महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और महिला सहकारी समितियों की भूमिका को भी मजबूत करना चाहती है। नई नीति के तहत महिलाओं को स्वरोजगार, लघु उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में अधिक अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया जाएगा।
इससे ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ने और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
डिजिटल और पारदर्शी व्यवस्था पर जोर
नई सहकारिता नीति में डिजिटल तकनीक के उपयोग को बढ़ावा देने की योजना है। इसके तहत—
समितियों के रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण।
ऑनलाइन लेखा-जोखा प्रणाली।
डिजिटल भुगतान व्यवस्था।
नियमित ऑडिट और निगरानी।
पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन।
इन उपायों से भ्रष्टाचार की संभावनाओं में कमी और प्रशासनिक दक्षता में सुधार लाने का लक्ष्य रखा गया है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगी मजबूती
विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत सहकारिता प्रणाली ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का प्रभावी माध्यम बन सकती है। यदि सहकारी संस्थाएं बेहतर ढंग से काम करें तो कृषि, डेयरी, मत्स्य पालन, बागवानी और लघु उद्योग जैसे क्षेत्रों को नई गति मिल सकती है।
इसके साथ ही ग्रामीण युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार और उद्यमिता के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
विपणन और मूल्य संवर्धन पर फोकस
नई नीति में केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि उत्पादों के विपणन और मूल्य संवर्धन पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। सरकार चाहती है कि सहकारी समितियां किसानों और उत्पादकों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराएं, ताकि उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिल सके।
इसके लिए प्रसंस्करण इकाइयों, कोल्ड स्टोरेज और आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) को मजबूत करने पर भी विचार किया जा रहा है।
प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण
सहकारी समितियों के पदाधिकारियों और सदस्यों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की भी योजना है। आधुनिक प्रबंधन, वित्तीय अनुशासन, डिजिटल तकनीक और विपणन कौशल से जुड़े प्रशिक्षण उन्हें अधिक प्रभावी ढंग से कार्य करने में मदद करेंगे।
राज्य के विकास में सहकारिता की भूमिका
सरकार का मानना है कि सहकारिता केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि सामाजिक विकास का भी महत्वपूर्ण माध्यम है। इससे छोटे किसानों, ग्रामीण कारीगरों और कमजोर वर्गों को संगठित होकर बेहतर अवसर प्राप्त करने में मदद मिलती है।
नई नीति का उद्देश्य राज्य में सहकारिता आंदोलन को अधिक व्यापक और प्रभावशाली बनाना है, ताकि ग्रामीण विकास और समावेशी आर्थिक प्रगति को गति मिल सके।
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