
रांची। झारखंड और पश्चिम बंगाल के बीच लंबे समय से चले आ रहे नदी जल बंटवारे और बांधों के नियंत्रण संबंधी विवाद के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हुई है। दोनों राज्यों के बीच मयूराक्षी उप-बेसिन के जल बंटवारे को लेकर प्रस्तावित समझौते का मसौदा तैयार कर लिया गया है। झारखंड सरकार ने इस मसौदे को मंजूरी दे दी है। अब पश्चिम बंगाल सरकार के साथ समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। प्रस्तावित व्यवस्था में दोनों राज्यों के बीच पानी का मात्रात्मक बंटवारा निर्धारित करने के साथ मसानजोर और तेनुघाट बांध के संयुक्त नियंत्रण से जुड़े प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। इस समझौते को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की सहमति महत्वपूर्ण होगी। माना जा रहा है कि इस पहल से दोनों राज्यों के बीच जल संसाधनों के उपयोग और बांध प्रबंधन को लेकर लंबे समय से चली आ रही समस्याओं के समाधान का रास्ता खुल सकता है।
प्रस्तावित समझौते की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता जल का मात्रात्मक यानी वॉल्यूमेट्रिक बंटवारा है। इसके तहत दोनों राज्यों के बीच उपलब्ध जल की निश्चित मात्रा के आधार पर हिस्सेदारी निर्धारित करने की व्यवस्था प्रस्तावित है। इससे पानी के उपयोग को लेकर स्पष्टता आने की उम्मीद है। अभी तक जल बंटवारे और बांधों के संचालन को लेकर दोनों राज्यों के बीच समय-समय पर मतभेद सामने आते रहे हैं। नई व्यवस्था लागू होने पर जल वितरण से जुड़ी जिम्मेदारियों और अधिकारों को अधिक स्पष्ट किया जा सकेगा।
मयूराक्षी नदी झारखंड और पश्चिम बंगाल के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत है। इस नदी का उद्गम झारखंड में होता है और इसका पानी आगे पश्चिम बंगाल तक पहुंचता है। नदी पर बने मसानजोर बांध का उपयोग सिंचाई और अन्य जल संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता है। हालांकि, बांध झारखंड की भौगोलिक सीमा में स्थित होने और उसके संचालन से पश्चिम बंगाल को मिलने वाले लाभ को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है।
मसानजोर बांध झारखंड के दुमका जिले में स्थित है। इस बांध के प्रबंधन और जल उपयोग को लेकर दोनों राज्यों के बीच समय-समय पर पत्राचार और बैठकें होती रही हैं। झारखंड की ओर से यह मुद्दा उठाया जाता रहा है कि बांध राज्य की सीमा में स्थित होने के बावजूद उसके जल संसाधनों का पर्याप्त लाभ स्थानीय क्षेत्रों को नहीं मिल पा रहा है।
दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में मयूराक्षी परियोजना के पानी का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है। ऐसे में दोनों राज्यों के हितों के बीच संतुलन बनाना किसी भी नए समझौते की प्रमुख चुनौती होगी।
मसानजोर और तेनुघाट बांध के संयुक्त नियंत्रण की तैयारी
प्रस्तावित मसौदे में मसानजोर बांध के साथ तेनुघाट बांध के संयुक्त नियंत्रण की संस्थागत व्यवस्था भी शामिल की गई है। हालांकि, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मसानजोर बांध मयूराक्षी उप-बेसिन में स्थित है, जबकि तेनुघाट बांध दामोदर उप-बेसिन का हिस्सा है।
नई व्यवस्था का उद्देश्य दोनों बांधों से जुड़े प्रबंधन, जल वितरण और प्रशासनिक समन्वय को बेहतर बनाना है। संयुक्त नियंत्रण की संस्थागत प्रणाली बनने से संबंधित राज्यों के बीच जल उपयोग से जुड़े फैसलों में बेहतर तालमेल स्थापित होने की उम्मीद है।
इस व्यवस्था से बांधों के संचालन और पानी की उपलब्धता से संबंधित जानकारी साझा करने की प्रक्रिया भी अधिक व्यवस्थित हो सकती है। हालांकि, संयुक्त नियंत्रण के लिए प्रस्तावित संस्था की अंतिम संरचना, अधिकार और जिम्मेदारियां समझौते के औपचारिक रूप लेने के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होंगी।
सिंचाई व्यवस्था को मिल सकता है लाभ
झारखंड और पश्चिम बंगाल दोनों ही राज्यों में बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है। ऐसे में जल संसाधनों का प्रभावी उपयोग किसानों के लिए महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से रबी और गर्मी के मौसम में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता किसानों की प्रमुख जरूरत होती है।
मयूराक्षी नदी और मसानजोर बांध के जल का उपयोग कृषि कार्यों में किया जाता है। यदि दोनों राज्यों के बीच पानी की हिस्सेदारी और वितरण की स्पष्ट व्यवस्था बनती है, तो इससे सिंचाई योजनाओं को बेहतर तरीके से संचालित करने में मदद मिल सकती है।
झारखंड के दुमका और आसपास के क्षेत्रों में लंबे समय से मसानजोर बांध के पानी से स्थानीय किसानों को अधिक लाभ देने की मांग उठती रही है। प्रस्तावित समझौते से इन मांगों के समाधान की संभावना बढ़ सकती है।
पश्चिम बंगाल के लिए भी नदी जल का नियमित और नियोजित उपयोग महत्वपूर्ण है। इस कारण दोनों राज्यों के बीच होने वाला समझौता कृषि और जल प्रबंधन की दृष्टि से अहम माना जा रहा है।
केंद्र सरकार की सहमति होगी महत्वपूर्ण
दोनों राज्यों के बीच प्रस्तावित समझौते को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। अंतरराज्यीय नदी जल बंटवारे से जुड़े मामलों में केंद्रीय स्तर पर समन्वय आवश्यक होता है।
प्रस्तावित मसौदे पर दोनों राज्य सरकारों के बीच सहमति बनने के बाद संबंधित प्रक्रियाएं पूरी की जाएंगी। इसके बाद समझौते के कार्यान्वयन और जल वितरण के लिए निर्धारित व्यवस्था प्रभावी हो सकेगी।
इससे पहले भी पूर्वी भारत में अंतरराज्यीय जल विवादों के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हुई है। अगस्त 2026 में बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर समझौता हुआ था। यह समझौता केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में संपन्न हुआ था।
अब मयूराक्षी जल बंटवारे पर प्रस्तावित समझौते को भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
पुराने विवाद के समाधान की बढ़ी उम्मीद
मसानजोर बांध से जुड़े जल बंटवारे और प्रशासनिक नियंत्रण के मुद्दे पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। यह विषय राजनीतिक स्तर के साथ न्यायिक प्रक्रिया में भी उठाया जा चुका है।
विभिन्न बैठकों में दोनों राज्यों के अधिकारियों ने जल वितरण और बांध संचालन से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श किया है। पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठकों में भी मसानजोर बांध का विषय उठ चुका है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराज्यीय जल समझौते तभी अधिक प्रभावी होते हैं, जब उनमें पानी की उपलब्धता, मौसमी बदलाव, सिंचाई की जरूरतों और निगरानी व्यवस्था का स्पष्ट उल्लेख हो।
प्रस्तावित समझौते से दोनों राज्यों के बीच जल वितरण के संबंध में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ने की उम्मीद है। इसके साथ ही भविष्य में संभावित विवादों के समाधान के लिए संस्थागत व्यवस्था विकसित करने का अवसर भी मिलेगा।
फिलहाल झारखंड सरकार की मंजूरी के बाद समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद है। पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र की सहमति मिलने के बाद यह स्पष्ट होगा कि दोनों राज्यों को कितना पानी मिलेगा और बांधों के संयुक्त संचालन की व्यवस्था किस प्रकार लागू की जाएगी।
यदि प्रस्तावित समझौता अंतिम रूप लेता है, तो यह झारखंड और पश्चिम बंगाल के बीच जल संसाधन प्रबंधन में सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।





