झारखंड

महुआ बनेगा आजीविका का सहारा, प्रसंस्करण और बाजार से खुलेंगे नए अवसर

nidhi
26 Oct 2026 9:20 AM IST
महुआ बनेगा आजीविका का सहारा, प्रसंस्करण और बाजार से खुलेंगे नए अवसर
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झारखंड : जंगलों में मिलने वाला महुआ ग्रामीण परिवारों की आमदनी बढ़ाने का जरिया बन सकता है। महुआ से लड्डू, बिस्कुट और दूसरे खाद्य उत्पाद तैयार करने की पहल इसके व्यावसायिक इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ा रही है। हालांकि, केवल उत्पाद बनाना पर्याप्त नहीं है। साफ फूलों का संग्रह, सही तरीके से सुखाना, सुरक्षित भंडारण और खरीदारों तक पहुंच भी जरूरी है। राज्य में महुआ के इस्तेमाल और संग्रह से जुड़ी अलग-अलग पहल इसी दिशा में रास्ता दिखा रही हैं।

महुआ के फूल इकट्ठा करने वाले परिवारों के लिए इसकी गुणवत्ता का सीधा संबंध मिलने वाली कीमत से है। जमीन पर गिरे फूलों में मिट्टी और दूसरी गंदगी मिल जाती है। बारिश या नमी से फूल खराब होने का खतरा भी रहता है। ऐसे में संग्रह के शुरुआती चरण में सुधार किया जाए तो आगे खाद्य उत्पाद बनाने के लिए बेहतर कच्चा माल उपलब्ध हो सकता है। इससे ग्रामीणों को अपनी उपज का अधिक मूल्य मिलने की संभावना बढ़ती है।
वन विभाग ने लातेहार के छिपादोहर पूर्वी और पश्चिमी वन क्षेत्र में महुआ के पेड़ों के नीचे जाली लगाने की पहल की है। अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, इसका उद्देश्य फूलों को जमीन पर गिरकर खराब होने से बचाना और ग्रामीणों की आमदनी बढ़ाना है। फूल सीधे जाली पर गिरेंगे, जिससे उन्हें साफ अवस्था में एकत्र करना आसान होगा। इस प्रयोग के सफल होने पर इसे पूरे पलामू टाइगर रिजर्व क्षेत्र में विस्तार देने की बात कही गई थी।
इस व्यवस्था का संबंध जंगलों की सुरक्षा से भी है। महुआ चुनने के लिए पेड़ के नीचे की जमीन साफ करने के दौरान कुछ स्थानों पर सूखी पत्तियों में आग लगाई जाती है। यह आग फैलने पर आसपास की वनस्पति और वन्यजीवों के लिए खतरा बन सकती है। जाली लगने से जमीन जलाकर साफ करने की जरूरत घटाने में मदद मिल सकती है। इस तरह बेहतर संग्रह व्यवस्था ग्रामीणों की आजीविका और वन संरक्षण, दोनों के लिए उपयोगी हो सकती है।
रिपोर्ट में महुआ सुखाने के लिए धूप वाली जगह पर मचान बनाने और भंडारण के लिए विशेष बैग उपलब्ध कराने का भी उल्लेख है। विभाग की ओर से खरीदार कंपनी से समझौते की जानकारी दी गई थी। उस समय खरीद दर 70 रुपये प्रति किलो बताई गई थी। यह अप्रैल की रिपोर्ट में दर्ज दर है; इसे वर्तमान बाजार भाव नहीं माना जाना चाहिए। संग्रह से बिक्री तक व्यवस्था बनाने का यह प्रयास बताता है कि गुणवत्ता के साथ बाजार का जुड़ाव कितना जरूरी है।
महुआ के खाद्य उत्पादों को लेकर झारखंड में पहले भी प्रयोग हुए हैं। सरायकेला-खरसावां जिले के कुचाई प्रखंड स्थित बड़ा सेगोई गांव में इनोवेटिव झारखंड योजना के तहत महुआ प्रसंस्करण संयंत्र बनाने की जानकारी सामने आई थी। यह उदाहरण बताता है कि महुआ को केवल कच्चे फूल के रूप में बेचने से आगे बढ़कर स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण की दिशा में काम हुआ है। हालांकि, उस पुरानी जानकारी के आधार पर संयंत्र की वर्तमान उत्पादन क्षमता या बिक्री का दावा नहीं किया जा सकता।
महुआ से तैयार खाद्य उत्पाद ग्रामीण महिलाओं के लिए भी अवसर खोल सकते हैं। फूलों की सफाई, छंटाई, प्रसंस्करण और पैकिंग जैसे काम स्थानीय स्तर पर किए जा सकते हैं। यदि महिला समूहों को प्रशिक्षण और नियमित खरीदार मिलें तो वे इस गतिविधि से अतिरिक्त आय हासिल कर सकती हैं। लेकिन वास्तविक कमाई कच्चे माल, अन्य सामग्री, ईंधन, पैकिंग और परिवहन पर होने वाले खर्च के बाद ही तय होगी। बिक्री बढ़ने के साथ लागत का हिसाब रखना भी उतना ही जरूरी होगा।
झारखंड में ट्राइफेड के क्षेत्रीय प्रबंधक शैलेंद्र कुमार राजू ने वन धन विकास केंद्रों, मूल्य संवर्धन और प्रशिक्षण के माध्यम से आदिवासी समुदायों के साथ काम करने की जानकारी दी है। उनके अनुसार, स्थानीय उत्पादों को आउटलेट, मेलों और प्रदर्शनियों के जरिए बाजार उपलब्ध कराया जाता है। महुआ सहित वनोपज को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने तकनीक, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच को जोड़ने वाली व्यापक व्यवस्था की जरूरत बताई है।
लड्डू और कुकीज जैसे उत्पादों की नियमित बिक्री के लिए स्वाद और गुणवत्ता में एकरूपता भी आवश्यक होगी। साफ कार्यस्थल, उचित पैकिंग और उत्पाद कितने समय तक सुरक्षित रहेगा, इसकी जानकारी खरीदारों का भरोसा बढ़ा सकती है। स्थानीय मेलों में शुरुआती बिक्री के बाद दुकानों या अन्य बाजारों तक पहुंच बनाने की जरूरत होगी। प्रशिक्षण के साथ इन पहलुओं पर काम होने पर ही उत्पादन लंबे समय तक चल पाएगा और ग्रामीणों को नियमित आर्थिक लाभ मिल सकेगा। महुआ आधारित आजीविका की संभावना उत्साहजनक है, लेकिन उपलब्ध जानकारी में जाली से संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन की अलग-अलग पहलें सामने आती हैं। इन्हें लड्डू-कुकीज बनाने की किसी एक नई घोषित राज्यव्यापी योजना के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। इन प्रयासों को जोड़कर आगे बढ़ाया जाए तो ग्रामीण परिवारों को बेहतर मूल्य मिलने और जंगलों में आग का खतरा कम करने की दिशा में लाभ हो सकता है।

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