
Jharkhand झारखंड : मधुपुर के डालमिया कूप चौक और गांधी चौक के पास वर्षों से आदिवासी महिलाओं की एक अलग ही तस्वीर देखने को मिलती है, जहां उनकी आजीविका पूरी तरह जंगल से मिलने वाले संसाधनों पर निर्भर है। ये महिलाएं अपने अनुभव और परंपरा के सहारे दोना-पत्तल, दातुन और अन्य वन उत्पादों की बिक्री कर अपना जीवनयापन कर रही हैं।
स्थानीय महिलाओं का कहना है कि उनके लिए “जंगल का पत्ता ही सबसे बड़ा सहारा” है, क्योंकि इसी से उनके परिवार की रोजी-रोटी चलती है। सुबह-सुबह आसपास के गांवों जैसे जगदीशपुर, बुढ़ई, जाभागुड़ी, पथलजोर, जीतपुर, चेचाली, महुआडाबर, पिपरासोल और सरपत्ता समेत कई गांवों से महिलाएं मधुपुर शहर पहुंचती हैं।
ये महिलाएं सिर पर गठरी में साल, पलाश और सागवान के पत्तों से बने दोना-पत्तल, दातुन, महुआ और अन्य जंगली उत्पाद लेकर आती हैं और इन्हें स्थानीय बाजार में बेचती हैं। इसी आय से वे अपने परिवार का खर्च चलाती हैं।
इस व्यवस्था में स्थानीय मारवाड़ी समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। वर्षों से शहर के कई व्यवसायी इन महिलाओं को अपने घर और दुकानों के चबूतरे तथा बरामदों में बैठने की जगह उपलब्ध करा रहे हैं, जिससे वे आसानी से अपना सामान बेच सकें।
महिलाओं का कहना है कि यदि यह सहयोग न मिलता तो उनके लिए शहर में जगह पाना और सामान बेचना मुश्किल होता। यह सहयोग उनके लिए आजीविका का एक स्थायी सहारा बन गया है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और इससे न केवल आदिवासी महिलाओं को रोजगार मिला है, बल्कि शहर में पारंपरिक वन उत्पादों की उपलब्धता भी बनी हुई है।
हालांकि महिलाओं का यह भी कहना है कि उन्हें बेहतर बाजार, उचित मूल्य और सरकारी सहयोग की आवश्यकता है, ताकि उनकी आय और अधिक स्थिर हो सके।
फिलहाल मधुपुर की यह व्यवस्था सामाजिक सहयोग और परंपरागत आजीविका का एक उदाहरण बनकर सामने आ रही है, जहां जंगल से जुड़ी जीवनशैली आज भी लोगों की जरूरतों को पूरा कर रही है।





