
Jharkhand झारखण्ड : देश आजादी के 75 वर्ष पूरे कर ‘अमृतकाल’ की ओर बढ़ रहा है और सरकार की ओर से डिजिटल इंडिया, स्मार्ट गांव और विकास योजनाओं के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत आज भी कई इलाकों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव को उजागर कर रही है।
Rali Beda Village (रकुवा पंचायत के लिपिया गांव के अंतर्गत) की स्थिति इसका एक बड़ा उदाहरण है, जहां आज भी ग्रामीण स्वच्छ पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित हैं। यह गांव मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के गृह जिले से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित है और पहाड़ की तलहटी में बसा हुआ है।
Hemant Soren के गृह क्षेत्र से जुड़े इस इलाके में करीब 60 परिवारों के लगभग 350 लोग रहते हैं, जो आज भी पीने के पानी के लिए पारंपरिक स्रोतों पर निर्भर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में अब तक कोई स्थायी पेयजल व्यवस्था नहीं है, जिससे उन्हें रोजाना कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
ग्रामीणों के अनुसार, गांव के पास स्थित पहाड़ की तलहटी से लगातार पानी का रिसाव होता रहता है, जिसे स्थानीय लोग जमा कर पीने और घरेलू उपयोग में लाते हैं। इस पानी को ही वे अपने जीवन का मुख्य आधार मानते हैं।
हालांकि यह स्रोत कुछ हद तक पानी की जरूरत पूरी करता है, लेकिन मौसम के अनुसार इसकी गुणवत्ता और उपलब्धता में भारी अंतर आता है। बरसात के मौसम में यह पानी गंदा और दूषित हो जाता है, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। वहीं गर्मी के दिनों में पानी का रिसाव कम होने से ग्रामीणों को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार प्रशासन से शिकायत करने के बावजूद अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है। गांव में न तो पाइपलाइन की सुविधा है और न ही कोई वैकल्पिक जल आपूर्ति व्यवस्था।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की समस्याएं ग्रामीण विकास योजनाओं की वास्तविक स्थिति को दर्शाती हैं, जहां योजनाओं का लाभ अभी भी अंतिम व्यक्ति तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया है।
ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि गांव में जल्द से जल्द स्थायी पेयजल व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए, ताकि उन्हें इस बुनियादी समस्या से राहत मिल सके।
कुल मिलाकर, रालीबेड़ा गांव की स्थिति यह दर्शाती है कि विकास के दावों के बावजूद कई ग्रामीण क्षेत्र आज भी बुनियादी सुविधाओं के इंतजार में हैं।





