झारखंड

ट्रेनों में कीटों का कहर, हजारों शिकायतों के बाद भी नहीं थमी समस्या

nidhi
6 Oct 2026 7:21 AM IST
ट्रेनों में कीटों का कहर, हजारों शिकायतों के बाद भी नहीं थमी समस्या
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रेलवे के पेस्ट कंट्रोल पर सवाल
नई दिल्ली: भारतीय रेलवे की ट्रेनों में सफाई और कीट-रोडेंट नियंत्रण को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की रिपोर्ट बताती है कि ट्रेनों में काकरोच, चूहे और अन्य कीटों की शिकायतें लंबे समय से बनी हुई हैं। रेलवे के पास इनके नियंत्रण के लिए तय नियम, रसायन और नियमित उपचार की व्यवस्था है, लेकिन शिकायतों का सिलसिला पूरी तरह थमा नहीं है।
CAG की रिपोर्ट के अनुसार 2018-19 से 2022-23 के बीच चुने गए कोचिंग डिपो में पेस्ट और रोडेंट कंट्रोल से जुड़ी 10,588 कमियां रेलवे अधिकारियों ने दर्ज कीं। इसके अलावा यात्रियों से भी हजारों शिकायतें मिलीं। रेलवे ने अनुबंध की शर्तों का पालन नहीं करने पर ठेकेदारों से जुर्माना भी वसूला, लेकिन ऑडिट में कहा गया कि पेस्ट और चूहों की समस्या फिर भी जारी रही।
साल 2022-23 में रेल मदद पर कीट और चूहों से संबंधित 15,028 शिकायतें दर्ज हुई थीं। इनमें से लगभग 79 प्रतिशत शिकायतें एसी श्रेणियों, यानी 3E से लेकर फर्स्ट एसी तक, के यात्रियों से आई थीं। इससे साफ है कि समस्या केवल सामान्य या स्लीपर डिब्बों तक सीमित नहीं है। रेलवे बोर्ड ने पेस्ट कंट्रोल के लिए पहले से विस्तृत व्यवस्था तय कर रखी है। इसमें केमिकल स्प्रे, जेल ट्रीटमेंट, फॉगिंग, फ्यूमिगेशन और रोडेंट कंट्रोल शामिल हैं। एसी और पैंट्री कारों में पेस्ट कंट्रोल हर पखवाड़े और चूहों पर नियंत्रण का काम हर प्राइमरी मेंटेनेंस के दौरान किया जाना चाहिए।
इसके बावजूद हाल में फर्स्ट एसी में चूहे द्वारा यात्री को काटने की घटना ने चिंता और बढ़ा दी। एक रिपोर्ट के मुताबिक ऊना-इंदौर एक्सप्रेस के फर्स्ट एसी कोच में सो रहे 78 वर्षीय यात्री की नाक पर चूहे ने काट लिया, जिसके बाद उसे अस्पताल ले जाया गया। यह घटना उस श्रेणी में हुई जिसे रेलवे की सबसे प्रीमियम यात्रा श्रेणियों में गिना जाता है। समस्या सिर्फ काकरोच और चूहों तक सीमित नहीं है। यात्रियों की शिकायतों में एसी डिब्बों में अनधिकृत या बिना उचित आरक्षण वाले लोगों की भीड़ का मुद्दा भी सामने आता रहा है। हालांकि इस संबंध में सोशल मीडिया पर सामने आने वाली हर शिकायत स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं होती, लेकिन ऐसी घटनाएं यात्री सुविधा और निगरानी व्यवस्था पर सवाल जरूर उठाती हैं।
रेलवे के सामने चुनौती दोहरी है—एक तरफ कोचों में नियमित पेस्ट और रोडेंट कंट्रोल को प्रभावी बनाना, दूसरी तरफ आरक्षित और प्रीमियम श्रेणियों में केवल अधिकृत यात्रियों की आवाजाही सुनिश्चित करना। कागज पर व्यवस्था मजबूत दिखती है, लेकिन शिकायतों की संख्या बताती है कि जमीनी स्तर पर निगरानी और जवाबदेही बढ़ाने की जरूरत अभी भी बनी हुई है।
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