झारखंड

देवघर में पहले मां काली, फिर बाबा बैद्यनाथ! जानिए इस अनूठी धार्मिक परंपरा का रहस्य

nidhi
1 Aug 2026 7:52 AM IST
देवघर में पहले मां काली, फिर बाबा बैद्यनाथ! जानिए इस अनूठी धार्मिक परंपरा का रहस्य
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बाबा बैद्यनाथ धाम की खास परंपरा, मां काली के श्रृंगार के बाद ही शुरू होती है पूजा-अर्चना

देवघर : झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में सदियों से चली आ रही एक अनूठी धार्मिक परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जाती है। यहां बाबा बैद्यनाथ का श्रृंगार करने से पहले मां काली का श्रृंगार किया जाता है। यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शैव और शाक्त परंपराओं के अद्भुत समन्वय का प्रतीक मानी जाती है। सावन और भाद्रपद के पवित्र महीनों में यह परंपरा विशेष महत्व रखती है और इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु देवघर पहुंचते हैं।

सदियों पुरानी है यह परंपरा
बैद्यनाथ धाम देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ 51 शक्तिपीठों में भी शामिल माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यहां भगवान शिव और माता शक्ति का विशेष संगम है। इसी कारण मंदिर की दैनिक पूजा व्यवस्था में भी शिव और शक्ति दोनों को समान महत्व दिया जाता है।
इसी परंपरा के तहत हर दिन सबसे पहले मंदिर परिसर में स्थित मां काली का श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद ही बाबा बैद्यनाथ का श्रृंगार और अन्य पूजा-अर्चना की प्रक्रिया शुरू होती है। मंदिर के पुजारियों का मानना है कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसका पालन आज भी पूरी श्रद्धा के साथ किया जाता है।
क्या है धार्मिक महत्व?
सनातन परंपरा में भगवान शिव और मां शक्ति को एक-दूसरे का पूरक माना गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार शक्ति के बिना शिव 'शव' के समान हैं। इसलिए जहां शिव की आराधना होती है, वहां शक्ति की उपासना का भी विशेष महत्व होता है।
देवघर में पहले मां काली का श्रृंगार किए जाने की परंपरा इसी आध्यात्मिक सिद्धांत को दर्शाती है। मान्यता है कि मां काली की पूजा और श्रृंगार के बाद बाबा बैद्यनाथ का श्रृंगार करने से पूजा पूर्ण मानी जाती है और भक्तों को शिव एवं शक्ति दोनों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
शक्तिपीठ और ज्योतिर्लिंग का अद्भुत संगम
बैद्यनाथ धाम का महत्व इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसे ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों का दर्जा प्राप्त है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सती के अंग यहां गिरे थे, जिसके कारण यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। वहीं भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के कारण इसकी महिमा और भी बढ़ जाती है।
यही कारण है कि यहां की पूजा-पद्धति में शिव और शक्ति दोनों की उपासना को विशेष स्थान दिया गया है।
सावन में बढ़ जाता है महत्व
सावन के महीने में लाखों कांवड़िये सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर पैदल यात्रा करते हुए बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करने देवघर पहुंचते हैं। इस दौरान मंदिर में होने वाले विशेष श्रृंगार और पूजा-अर्चना का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
श्रद्धालु मानते हैं कि बाबा बैद्यनाथ के दर्शन से पहले मां काली का श्रृंगार होना इस बात का प्रतीक है कि सृष्टि का संचालन शिव और शक्ति दोनों के संयुक्त स्वरूप से होता है।
श्रद्धालुओं की अटूट आस्था
मंदिर के पुजारियों के अनुसार, यह परंपरा केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं बल्कि आस्था, संस्कृति और आध्यात्मिक संतुलन का संदेश भी देती है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु इस अनूठी परंपरा के बारे में जानने के बाद इसकी विशेषता को समझते हैं और इसे बैद्यनाथ धाम की पहचान मानते हैं।
देवघर का बैद्यनाथ धाम केवल ज्योतिर्लिंग के दर्शन का स्थान नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की उस विरासत का भी प्रतीक है, जहां शिव और शक्ति की संयुक्त आराधना को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।

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