
रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने करीब 18 साल पुराने एक वैवाहिक विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पत्नी की तलाक के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी है। मामला एक ऐसी मासूम बच्ची से जुड़ा है, जो महज सात महीने की उम्र में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। बच्ची के इलाज के लिए उसे मुंबई तक ले जाना पड़ा था। पति का आरोप था कि इस कठिन समय में पत्नी ने न तो बच्ची की देखभाल की और न ही इलाज के दौरान परिवार का साथ दिया। सात महीने की बेटी को छोड़कर मायके गई पत्नी फिर पति के पास वापस नहीं लौटी। अदालत ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए बीमार बच्ची की देखभाल नहीं करने और लंबे समय तक पति से अलग रहने को वैवाहिक क्रूरता तथा परित्याग के दायरे में माना। हालांकि, अदालत ने पत्नी को मिलने वाले मासिक गुजारा भत्ते में बढ़ोतरी करते हुए इसे 10 हजार रुपये से बढ़ाकर 15 हजार रुपये कर दिया।
यह मामला पति-पत्नी के बीच लंबे समय से चले आ रहे वैवाहिक विवाद से संबंधित है। करीब 18 वर्षों से दोनों के बीच संबंधों को लेकर कानूनी लड़ाई चल रही थी। विवाद की सबसे संवेदनशील बात उनकी छोटी बेटी की गंभीर बीमारी थी। बच्ची को उस उम्र में कैंसर जैसी बीमारी का सामना करना पड़ा, जब वह पूरी तरह अपने माता-पिता की देखभाल पर निर्भर थी। बीमारी की गंभीरता को देखते हुए बच्ची को इलाज के लिए मुंबई ले जाना पड़ा।
पति ने अदालत के सामने आरोप लगाया था कि बेटी के इलाज और देखभाल की जिम्मेदारी निभाने के दौरान उसे पत्नी का सहयोग नहीं मिला। उसके अनुसार, पत्नी ने न केवल बीमार बच्ची की देखभाल से दूरी बनाई, बल्कि वह मायके चली गई और इसके बाद वापस वैवाहिक घर नहीं लौटी। पति का कहना था कि इतनी गंभीर परिस्थिति में पत्नी का परिवार से अलग हो जाना उसके लिए मानसिक पीड़ा का कारण बना।
मामले में सामने आई जानकारी के अनुसार, बच्ची की उम्र महज सात महीने थी, जब पत्नी उसे छोड़कर मायके चली गई थी। उस समय बच्ची को विशेष देखभाल और चिकित्सकीय सहायता की जरूरत थी। कैंसर जैसी बीमारी के उपचार के दौरान माता-पिता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में पति ने पत्नी के व्यवहार को वैवाहिक जिम्मेदारियों की अनदेखी बताते हुए अदालत के समक्ष अपनी बात रखी।
लंबे समय तक चले इस विवाद में पति-पत्नी के संबंधों की स्थिति भी महत्वपूर्ण मुद्दा रही। पत्नी के मायके जाने के बाद वापस पति के पास नहीं लौटने की बात अदालत के सामने रखी गई। पति ने इसे वैवाहिक संबंधों से अलग होने और पारिवारिक जिम्मेदारियों से दूरी बनाने के रूप में प्रस्तुत किया। मामले में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण रहा कि दोनों के बीच अलगाव लंबे समय तक बना रहा।
झारखंड हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान वैवाहिक क्रूरता और परित्याग से जुड़े पहलुओं पर विचार किया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, अदालत ने बीमार बच्ची की देखभाल नहीं करने और पति से लंबे समय तक अलग रहने की परिस्थितियों को महत्वपूर्ण माना। इन्हीं आधारों पर पत्नी की तलाक के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी गई।
अदालत का यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वैवाहिक विवादों में केवल पति-पत्नी के आपसी संबंध ही नहीं, बल्कि बच्चों की देखभाल और पारिवारिक जिम्मेदारियां भी महत्वपूर्ण होती हैं। विशेष रूप से जब कोई बच्चा गंभीर बीमारी से पीड़ित हो, तब उसकी देखभाल से जुड़े तथ्य न्यायिक मूल्यांकन में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
वैवाहिक क्रूरता का प्रश्न केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं होता। विवाह संबंधी कानूनों के अंतर्गत कुछ परिस्थितियों में मानसिक पीड़ा पहुंचाने वाले व्यवहार को भी क्रूरता के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, किसी व्यवहार को वैवाहिक क्रूरता मानने का निर्णय संबंधित मामले के तथ्यों, साक्ष्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसी तरह परित्याग के मामलों में भी अलग रहने की अवधि के साथ उसके कारण और परिस्थितियां महत्वपूर्ण होती हैं।
इस मामले में हाईकोर्ट ने लंबे समय से चले आ रहे अलगाव और बच्ची की बीमारी के दौरान सामने आए व्यवहार को ध्यान में रखते हुए तलाक के फैसले को बरकरार रखा। पत्नी की ओर से तलाक के खिलाफ की गई अपील को अदालत से राहत नहीं मिली। इस प्रकार करीब 18 वर्षों से चले आ रहे वैवाहिक विवाद में तलाक के मुद्दे पर महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय सामने आया।
हालांकि, तलाक के मामले में पत्नी की अपील खारिज करने के बावजूद हाईकोर्ट ने उसके गुजारा भत्ते में बढ़ोतरी की है। पहले पत्नी को प्रतिमाह 10 हजार रुपये गुजारा भत्ता मिल रहा था। अदालत ने इस राशि को बढ़ाकर 15 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया। इस तरह पत्नी को मिलने वाली मासिक राशि में पांच हजार रुपये की वृद्धि की गई है।
गुजारा भत्ते में बढ़ोतरी का यह निर्णय भी मामले का महत्वपूर्ण पहलू है। अदालत ने जहां वैवाहिक संबंध समाप्त करने के फैसले को बरकरार रखा, वहीं पत्नी की आर्थिक सहायता से जुड़े विषय पर अलग निर्णय दिया। इससे स्पष्ट होता है कि तलाक और भरण-पोषण से संबंधित प्रश्नों का न्यायिक मूल्यांकन अलग-अलग कानूनी आधारों पर किया जा सकता है।
पत्नी को अब प्रतिमाह 15 हजार रुपये की राशि मिलेगी। इस हिसाब से गुजारा भत्ते की वार्षिक राशि एक लाख 80 हजार रुपये होगी। पहले 10 हजार रुपये प्रतिमाह के अनुसार सालाना एक लाख 20 हजार रुपये मिलते थे। इस प्रकार नई व्यवस्था में वार्षिक स्तर पर 60 हजार रुपये की बढ़ोतरी हुई है।
इस फैसले में सबसे संवेदनशील पहलू मासूम बच्ची की बीमारी और उसकी देखभाल से जुड़ा रहा। सात महीने की उम्र में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का सामना करना किसी भी बच्चे और उसके परिवार के लिए बेहद कठिन परिस्थिति होती है। ऐसे समय में परिवार के सदस्यों की जिम्मेदारियां और आपसी सहयोग विशेष महत्व रखते हैं। पति की ओर से लगाए गए आरोपों और अदालत के समक्ष आई परिस्थितियों ने इस मामले को सामान्य वैवाहिक विवाद से अलग बना दिया।
करीब 18 साल तक चले इस विवाद में हाईकोर्ट के फैसले ने तलाक और गुजारा भत्ते दोनों विषयों पर स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने पत्नी की अपील खारिज करते हुए तलाक को बरकरार रखा, लेकिन उसके मासिक भरण-पोषण की राशि बढ़ा दी। इस प्रकार पत्नी को तलाक के मुद्दे पर राहत नहीं मिली, जबकि आर्थिक सहायता के मामले में अदालत ने उसके पक्ष में निर्णय दिया।
झारखंड हाईकोर्ट का यह फैसला वैवाहिक संबंधों में पारिवारिक जिम्मेदारियों, बच्चों की देखभाल और लंबे समय तक अलग रहने की परिस्थितियों के महत्व को सामने लाता है। हालांकि, प्रत्येक वैवाहिक विवाद के तथ्य अलग होते हैं और किसी एक मामले का फैसला सभी मामलों पर स्वतः लागू नहीं होता।
फिलहाल करीब 18 साल पुराने इस मामले में पत्नी की तलाक के खिलाफ अपील खारिज हो चुकी है। हाईकोर्ट ने तलाक को बरकरार रखते हुए गुजारा भत्ता 10 हजार से बढ़ाकर 15 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया है। गंभीर बीमारी से जूझ रही मासूम बेटी की देखभाल और लंबे वैवाहिक अलगाव से जुड़ा यह मामला न्यायिक फैसले के बाद चर्चा में है।





