झारखंड

गैंगरेप मामले में हाईकोर्ट ने नहीं दी राहत, दोषी की अपील खारिज

Ashish verma
8 Oct 2026 11:11 PM IST
गैंगरेप मामले में हाईकोर्ट ने नहीं दी राहत, दोषी की अपील खारिज
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रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने नाबालिग लड़की से सामूहिक दुष्कर्म के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तीन दोषियों की 20 साल के कठोर कारावास की सजा बरकरार रखी है। अदालत ने दोषियों की ओर से दायर अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि दुष्कर्म पीड़िता के शरीर पर संघर्ष या प्रतिरोध के निशान नहीं मिलना उसकी गवाही को अविश्वसनीय मानने का आधार नहीं हो सकता। विशेष रूप से जब पीड़िता नाबालिग हो और चिकित्सकीय साक्ष्य घटना की पुष्टि करते हों, तब उसकी विश्वसनीय गवाही को केवल बाहरी चोटों के अभाव में खारिज नहीं किया जा सकता। जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने सिमडेगा की विशेष पॉक्सो अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए तीनों दोषियों की सजा और दोषसिद्धि को बरकरार रखा है।
सिमडेगा में वर्ष 2017 में हुई थी वारदात
यह मामला झारखंड के सिमडेगा जिले का है। घटना वर्ष 2017 में हुई थी। उस समय पीड़िता की उम्र करीब 16 वर्ष थी। पीड़िता एक परिचित के घर आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने गई थी।
रात करीब 10 बजे वह हाथ-पैर धोने के लिए घर के पास स्थित चापाकल पर पहुंची थी। इसी दौरान तीन लोगों ने उसे पकड़ लिया। मामले में दर्ज शिकायत के अनुसार, आरोपियों में से एक उसे जबरन पास के खेत में ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया, जबकि अन्य दो आरोपियों ने उसे पकड़कर रखा।
इसके बाद आरोपियों ने ग्रामीणों के आने के डर से पीड़िता को धोलपहाड़ी क्षेत्र में ले जाकर दोबारा यौन हिंसा की। आरोपियों ने घटना के बारे में किसी को जानकारी देने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी थी।
मां को बताई घटना, पुलिस ने दर्ज किया मामला
वारदात के बाद पीड़िता ने अपनी मां को पूरी घटना की जानकारी दी। बेटी की बात सुनने के बाद मां ने पुलिस को सूचना दी।
इसके आधार पर जलडेगा थाना क्षेत्र में वर्ष 2017 में प्राथमिकी दर्ज की गई। पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और पीड़िता के बयान तथा अन्य साक्ष्यों को एकत्र किया।
जांच पूरी होने के बाद आरोपियों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया गया। मामले में भारतीय दंड संहिता की सामूहिक दुष्कर्म से संबंधित धारा 376-डी और पॉक्सो अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मुकदमा चला।
विशेष पॉक्सो अदालत ने सुनाई थी 20 साल की सजा
सिमडेगा के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रथम सह विशेष पॉक्सो न्यायाधीश की अदालत ने मामले की सुनवाई की।
अदालत ने पीड़िता की गवाही, चिकित्सकीय रिपोर्ट और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद तीनों आरोपियों को दोषी करार दिया।
इसके बाद अदालत ने सामूहिक दुष्कर्म के अपराध में प्रत्येक दोषी को 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही प्रत्येक पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।
इस फैसले को चुनौती देते हुए दोषियों ने झारखंड हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
दोषियों ने पीड़िता की गवाही पर उठाए सवाल
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान दोषियों की ओर से पीड़िता के बयान की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि अभियोजन का मामला मुख्य रूप से पीड़िता की गवाही पर आधारित था। इसके अलावा मेडिकल जांच में शरीर पर संघर्ष या प्रतिरोध के स्पष्ट निशान नहीं मिले थे।
बचाव पक्ष ने इस आधार पर सामूहिक दुष्कर्म की घटना को संदेहास्पद बताने का प्रयास किया।
साथ ही यह भी दलील दी गई कि पीड़िता के परिवार और आरोपियों के बीच पहले से दुश्मनी थी, जिसके कारण उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया हो सकता है।
हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष की दलीलें खारिज कीं
जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद दोषियों की अपील खारिज कर दी।
अदालत ने कहा कि पीड़िता के शरीर पर संघर्ष के निशान नहीं मिलना अपने आप में उसकी गवाही पर अविश्वास करने का आधार नहीं है।
खंडपीठ ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि घटना के समय पीड़िता केवल 16 वर्ष की थी और तीन आरोपियों ने उसे अपने नियंत्रण में ले लिया था।
न्यायालय के अनुसार, पीड़िता की गवाही विश्वसनीय थी और चिकित्सकीय साक्ष्य भी उसके साथ यौन हिंसा होने की पुष्टि कर रहे थे।
मां की गवाही से भी मिली पुष्टि
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पीड़िता की मां के बयान को भी महत्वपूर्ण माना।
पीड़िता की मां ने अदालत में बताया था कि उसकी बेटी ने घटना के बाद उसे पूरी जानकारी दी थी। इसके बाद पुलिस को शिकायत की गई।
अदालत ने पाया कि पीड़िता के बयान और मां की गवाही में महत्वपूर्ण तथ्यों को लेकर समानता थी।
हालांकि मामले के अन्य गवाह घटना के प्रत्यक्षदर्शी नहीं थे, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस कारण पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने मेडिकल रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन के मामले को प्रमाणित माना।
पुरानी दुश्मनी का तर्क भी नहीं माना
दोषियों की ओर से प्रस्तुत पुरानी दुश्मनी के तर्क पर भी हाईकोर्ट ने विचार किया।
खंडपीठ ने पाया कि केवल आपसी रंजिश का आरोप लगा देने से पीड़िता की गवाही संदिग्ध नहीं हो जाती।
इसके लिए बचाव पक्ष को ऐसे ठोस तथ्य प्रस्तुत करने की आवश्यकता होती है, जो अभियोजन के साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर उचित संदेह पैदा कर सकें।
अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर माना कि अभियोजन ने तीनों दोषियों के खिलाफ अपराध संदेह से परे साबित किया है।
तीनों दोषियों को हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत
हाईकोर्ट ने विशेष पॉक्सो अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया।
खंडपीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376-डी और पॉक्सो अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत तीनों दोषियों की दोषसिद्धि बरकरार रखी।
इसके साथ ही 20 साल के कठोर कारावास और प्रत्येक पर लगाए गए 50 हजार रुपये के जुर्माने का फैसला भी कायम रहा।
यह मामला मुकेश बिलुंग एवं अन्य बनाम झारखंड राज्य, आपराधिक अपील संख्या 822/2018 से संबंधित है।
नाबालिग पीड़ितों की गवाही को लेकर महत्वपूर्ण फैसला
झारखंड हाईकोर्ट का यह निर्णय यौन अपराधों से संबंधित मामलों में साक्ष्यों के मूल्यांकन के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि शारीरिक चोटों या संघर्ष के निशानों का अभाव अपने आप में यह साबित नहीं करता कि यौन अपराध नहीं हुआ।
किसी भी मामले में पीड़िता के बयान की विश्वसनीयता, उसकी उम्र, घटना की परिस्थितियों और चिकित्सकीय साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है।
फिलहाल हाईकोर्ट ने तीनों दोषियों को राहत देने से इनकार करते हुए सिमडेगा की विशेष पॉक्सो अदालत से सुनाई गई 20 वर्ष की सजा बरकरार रखी है।
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