
Jharkhand: रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाने के मामले में झारखंड देश के पिछड़े राज्यों में शामिल हो गया है। मार्च 2026 तक राज्य में केवल 95 मेगावाट क्षमता ही स्थापित हो सकी है, जबकि गुजरात 6,882 मेगावाट के साथ पूरे देश में पहले स्थान पर पहुंच गया है। इस अंतर ने देश में सौर ऊर्जा के असंतुलित विकास को उजागर किया है।
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 तक देश की कुल रूफटॉप सोलर क्षमता 25.7 गीगावाट तक पहुंच चुकी है। वर्ष 2026 की पहली तिमाही में 2.7 गीगावाट नई क्षमता जोड़ी गई, जिसमें बड़ी हिस्सेदारी आवासीय क्षेत्रों की रही। प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना ने इसमें अहम भूमिका निभाई है, जिसके तहत परिवारों को 78 हजार रुपये तक सब्सिडी दी जा रही है।
गुजरात के बाद महाराष्ट्र 5,442 मेगावाट के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि राजस्थान 2,090 मेगावाट और केरल 1,850 मेगावाट के साथ आगे हैं। इसके मुकाबले झारखंड, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे पूर्वी राज्य काफी पीछे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, पूर्वी भारत में सौर ऊर्जा की कमी नहीं है, लेकिन कमजोर इकोसिस्टम, जागरूकता की कमी और धीमी प्रशासनिक प्रक्रिया बड़ी बाधा है। कई राज्यों में नेट मीटरिंग और मंजूरी प्रक्रिया धीमी है, जिससे उपभोक्ता रूफटॉप सोलर अपनाने से हिचकते हैं।
पूर्वोत्तर राज्यों में भी स्थिति कमजोर है। असम 344 मेगावाट के साथ आगे है, जबकि कई राज्यों में यह क्षमता बेहद कम है। वहीं उत्तर भारत में राजस्थान और हरियाणा बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सब्सिडी बढ़ाने से समस्या हल नहीं होगी, बल्कि वितरण कंपनियों, वेंडर नेटवर्क और वित्तीय व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। गुजरात और महाराष्ट्र की सफलता का कारण मजबूत इकोसिस्टम और तेज मंजूरी प्रक्रिया को माना जा रहा है।
देश का लक्ष्य 30 गीगावाट रूफटॉप सोलर का है, लेकिन अभी केवल 9.56 गीगावाट ही हासिल हो पाया है। साथ ही एक करोड़ परिवारों तक पहुंचने के लक्ष्य के मुकाबले करीब 32 लाख परिवार ही योजना से जुड़े हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले समय में रूफटॉप सोलर का विस्तार तभी संभव होगा जब नीतियां जमीन पर तेजी से लागू हों और राज्यों में बेहतर समन्वय स्थापित हो।





