झारखंड

बिहार-झारखंड के किसानों को औषधीय खेती से मिलेगा नया अवसर

Rajeshwari Nishad
27 Oct 2026 12:06 AM IST
बिहार-झारखंड के किसानों को औषधीय खेती से मिलेगा नया अवसर
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समस्तीपुर। बिहार और झारखंड के किसानों के लिए कृषि क्षेत्र से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), नई दिल्ली ने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले औषधीय पौधों को किसानों के खेतों तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की है। इस परियोजना का उद्देश्य औषधीय पौधों की वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देना और किसानों के लिए आय के नए अवसर तैयार करना है। परियोजना को धरातल पर उतारने की जिम्मेदारी बिहार के डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दिनेश राय को सौंपी गई है। इस पहल से दोनों राज्यों में औषधीय पौधों की खेती के विस्तार और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
जंगल और पहाड़ों से किसानों के खेतों तक पहुंचेंगे औषधीय पौधे
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की इस पहल का प्रमुख उद्देश्य प्राकृतिक क्षेत्रों में पाए जाने वाले औषधीय पौधों की खेती को कृषि व्यवस्था से जोड़ना है।बिहार और झारखंड के कई क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के औषधीय पौधे प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं।इन पौधों का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा, आयुर्वेद और औषधीय उत्पादों के निर्माण में किया जाता रहा है।हालांकि, सभी औषधीय पौधों की खेती सामान्य फसलों की तरह नहीं की जा सकती।इसके लिए उपयुक्त जलवायु, मिट्टी, रोपण सामग्री और वैज्ञानिक तकनीक की आवश्यकता होती है।इस परियोजना के माध्यम से ऐसे पौधों की पहचान और खेती की संभावनाओं पर काम किए जाने की उम्मीद है।
डॉ. दिनेश राय को सौंपी गई बड़ी जिम्मेदारी
इस महत्वाकांक्षी परियोजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दिनेश राय को दी गई है।कृषि अनुसंधान से जुड़े इस संस्थान की भूमिका किसानों तक वैज्ञानिक तकनीक और कृषि संबंधी जानकारी पहुंचाने में महत्वपूर्ण रही है।डॉ. दिनेश राय के नेतृत्व में परियोजना को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।इस कार्य में औषधीय पौधों की खेती से संबंधित वैज्ञानिक जानकारी, स्थानीय परिस्थितियों और किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होगा।हालांकि, परियोजना की कुल लागत, निर्धारित अवधि और इससे जुड़ने वाले किसानों की संख्या के बारे में विस्तृत आधिकारिक जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है।
पारंपरिक खेती के साथ मिलेगा नया विकल्प
बिहार और झारखंड में बड़ी संख्या में किसान धान, गेहूं, मक्का, दलहन और सब्जियों जैसी फसलों की खेती करते हैं।कई क्षेत्रों में किसानों की आय मौसम, बाजार भाव और उत्पादन लागत से प्रभावित होती है।ऐसी स्थिति में औषधीय पौधों की खेती एक अतिरिक्त विकल्प के रूप में उपयोगी साबित हो सकती है।यदि किसानों को सही पौधों का चयन, गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री और बाजार उपलब्ध कराया जाए, तो वे अपनी खेती में विविधता ला सकते हैं।हालांकि, औषधीय फसलों की खेती से अधिक लाभ मिलना निश्चित नहीं है।इसकी सफलता उत्पादन लागत, बाजार मांग, फसल की गुणवत्ता और खरीदारों तक पहुंच पर निर्भर करेगी।
औषधीय पौधों की बढ़ रही उपयोगिता
औषधीय पौधों का उपयोग आयुर्वेदिक उत्पादों, हर्बल उद्योग और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में किया जाता है।अश्वगंधा, शतावरी, तुलसी, कालमेघ और सर्पगंधा जैसे पौधे औषधीय उपयोग के लिए जाने जाते हैं।हालांकि, आईसीएआर की इस विशेष परियोजना में किन पौधों को शामिल किया गया है, इसकी पुष्टि नहीं हुई है।प्रत्येक औषधीय पौधे की खेती के लिए अलग-अलग कृषि परिस्थितियों की आवश्यकता हो सकती है।कुछ पौधे गर्म जलवायु में बेहतर विकसित होते हैं, जबकि अन्य को विशेष तापमान, नमी या छायादार वातावरण की जरूरत होती है।इसलिए किसी भी पौधे को बड़े पैमाने पर लगाने से पहले स्थानीय स्तर पर वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक होगा।
प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में मिल सकती है मदद
औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण पहलू प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी है।कई औषधीय पौधे जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों से एकत्र किए जाते हैं।यदि किसी पौधे की मांग अधिक हो और उसका अनियंत्रित संग्रह किया जाए, तो प्राकृतिक आबादी पर दबाव बढ़ सकता है।ऐसे पौधों की वैज्ञानिक खेती विकसित होने से जंगलों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।हालांकि, इसका अर्थ जंगलों से पौधों को बिना अनुमति निकालना नहीं है।प्राकृतिक जैव विविधता का संरक्षण करते हुए कानूनी और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के अनुसार रोपण सामग्री तैयार करना जरूरी होगा।
किसानों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण की होगी जरूरत
औषधीय पौधों की खेती सामान्य अनाज वाली फसलों से कई मामलों में अलग होती है।इनकी बुवाई, रोपाई, सिंचाई, पोषण प्रबंधन और कटाई के लिए विशेष तकनीक की आवश्यकता हो सकती है।
इसके अलावा, पौधों के औषधीय गुणों और गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए कटाई के बाद उचित प्रसंस्करण भी महत्वपूर्ण होता है।किसानों को सही समय पर फसल काटने, सुखाने और सुरक्षित भंडारण की जानकारी देना आवश्यक है।यदि परियोजना के तहत प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाता है, तो किसानों के लिए नई फसल अपनाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।हालांकि, प्रशिक्षण कार्यक्रमों की तिथियों और स्थानों की जानकारी अभी सामने नहीं आई है।
बिहार और झारखंड की भौगोलिक विविधता बनेगी आधार
बिहार और झारखंड की भौगोलिक परिस्थितियां एक-दूसरे से कई मामलों में अलग हैं।बिहार में मैदानी और जलोढ़ मिट्टी वाले कृषि क्षेत्र अधिक हैं, जबकि झारखंड में पठारी, पहाड़ी और वन क्षेत्र भी व्यापक रूप से पाए जाते हैं।ऐसी विविधता के कारण दोनों राज्यों में अलग-अलग प्रकार के औषधीय पौधों की खेती की संभावनाएं हो सकती हैं।किस क्षेत्र में कौन-सा पौधा उपयुक्त रहेगा, इसका निर्धारण मिट्टी, वर्षा, तापमान और अन्य स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।वैज्ञानिक अनुसंधान इस दिशा में किसानों को उपयोगी जानकारी प्रदान कर सकता है।
बाजार और खरीद व्यवस्था होगी महत्वपूर्ण
औषधीय पौधों की खेती तभी किसानों के लिए आर्थिक रूप से उपयोगी बन सकती है, जब तैयार उत्पाद की बिक्री के लिए भरोसेमंद बाजार उपलब्ध हो।इन पौधों की मांग विभिन्न औषधीय और हर्बल उत्पाद बनाने वाली इकाइयों में हो सकती है।लेकिन अलग-अलग पौधों की कीमत और बाजार मांग में अंतर रहता है।किसानों को फसल लगाने से पहले संभावित खरीदारों, गुणवत्ता मानकों और उत्पादन लागत की जानकारी मिलना जरूरी है।यदि बाजार से जुड़ाव नहीं हो, तो अच्छी पैदावार के बावजूद किसानों को आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।इसलिए खेती के साथ विपणन और प्रसंस्करण की व्यवस्था पर ध्यान देना भी महत्वपूर्ण होगा।
कृषि विश्वविद्यालय की भूमिका होगी अहम
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा कृषि अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में एक प्रमुख संस्थान है।इस परियोजना के माध्यम से विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक विशेषज्ञता का उपयोग औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने में किया जा सकता है।वैज्ञानिक परीक्षण, उपयुक्त पौधों की पहचान और किसानों को तकनीकी सलाह देने जैसी गतिविधियां इस प्रकार की परियोजनाओं में महत्वपूर्ण होती हैं।डॉ. दिनेश राय को परियोजना की जिम्मेदारी सौंपे जाने से इसके क्रियान्वयन में विश्वविद्यालय की भूमिका महत्वपूर्ण रहने की उम्मीद है।
किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में नई संभावना
आईसीएआर की यह पहल बिहार और झारखंड में कृषि विविधीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखी जा रही है।यदि परियोजना सफल रहती है, तो किसान पारंपरिक फसलों के साथ औषधीय पौधों की खेती को भी अपना सकते हैं।
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