
गुमला: आजादी के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी झारखंड के गुमला जिले का एक गांव आज भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है। रायडीह प्रखंड के नवागढ़ पंचायत स्थित आदिवासी बहुल गेतुपानी गांव के ग्रामीण आज के आधुनिक दौर में भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। प्रखंड मुख्यालय से महज पांच किलोमीटर की दूरी पर बसे इस गांव में आज तक न तो शुद्ध पेयजल की व्यवस्था हो सकी है, न चलने के लिए पक्की सड़क बनी है और न ही सरकारी बिजली पहुंच पाई है। प्रशासनिक उपेक्षा के शिकार इस गांव के 31 परिवारों का जीवन आज भी पूरी तरह भगवान भरोसे चल रहा है।
नल-जल और जल जीवन योजनाएं कागजों तक सीमित, ग्रामीण पी रहे गंदा पानी
केंद्र और राज्य सरकार की ओर से ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए 'नल जल योजना' और 'जल जीवन मिशन' जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं चलाई जा रही हैं। करोड़ों रुपये के बजट वाली ये योजनाएं गेतुपानी गांव के लिए महज एक सपना बनकर रह गई हैं। गांव की महिलाओं—संदीपा देवी, सोमारी देवी, सुकरी देवी, मांगो देवी, सारे देवी, सुकरमुनी देवी, सलमा देवी, शोभा देवी, लाजवंती देवी और अन्य ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि गांव में पीने के पानी का एकमात्र सहारा सिर्फ एक कुआं है।
यह कुआं भी खुला होने के कारण सुरक्षित नहीं है। बरसात के दिनों में तीन-चार महीनों तक आसपास का गंदा और दूषित पानी बहकर इसी कुएं में जमा हो जाता है। मजबूरी में ग्रामीणों को यही मटमैला और कीटाणुयुक्त पानी पीना पड़ता है। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि इस गंदे पानी के सेवन के कारण गांव में हमेशा कोई न कोई बीमार पड़ा रहता है। महिलाओं ने गुमला के उपायुक्त (डीसी) से मांग की है कि यदि गांव में एक जलमीनार (सोलर वाटर टावर) लगवा दिया जाए, तो उन्हें इस जानलेवा समस्या और बीमारियों से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी।
सड़क विहीन गांव: एंबुलेंस नहीं आती, 'बहंगी' बनती है मरीजों का सहारा
गेतुपानी गांव के विकास में सबसे बड़ा बाधक यहां सड़क का न होना है। गांव से प्रखंड मुख्यालय या मुख्य मार्ग तक जाने के लिए कोई पक्की या कच्ची सड़क नहीं है, बल्कि पथरीली और ऊबड़-खाबड़ पगडंडियां ही एकमात्र सहारा हैं। बरसात के मौसम में यह पगडंडी नुमा रास्ता भी पूरी तरह टूट जाता है और दलदल में बदल जाता है, जिसे ग्रामीण हर बार आपसी श्रमदान से चलने लायक बनाते हैं।
सड़क न होने का सबसे खौफनाक पहलू आपातकालीन चिकित्सा के समय देखने को मिलता है। दूषित पानी पीने से जब गांव के लोग गंभीर रूप से बीमार पड़ते हैं, तो चाहकर भी एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती। ऐसी स्थिति में ग्रामीणों के पास पारंपरिक 'बहंगी' (बांस और टोकरी से बना स्टretcher) ही एकमात्र विकल्प बचती है। मरीज को बहंगी पर लादकर ग्रामीण दो किलोमीटर तक पैदल चलकर मुख्य सड़क तक पहुंचाते हैं, जहां से उन्हें अस्पताल ले जाया जाता है। ग्रामीणों का दर्द है कि उनके लिए बहंगी ही एंबुलेंस का काम करती है, और कई बार समय पर इलाज न मिलने से स्थिति बेहद नाजुक हो जाती है।
10 साल पुराना सोलर प्लांट हुआ जर्जर, चंदा मांगकर करते हैं मरम्मत
बिजली के मामले में भी यह गांव पूरी तरह आत्मनिर्भर और असहाय है। गांव को सरकारी बिजली ग्रिड से अब तक नहीं जोड़ा गया है। करीब 10 वर्ष पहले 'प्रदान' संस्था द्वारा गांव में रोशनी के लिए 5 केवी का एक सोलर प्लांट लगाया गया था। लंबे समय से रखरखाव न होने और क्षमता से अधिक लोड होने के कारण यह सोलर प्लांट आए दिन खराब रहता है।
जब भी प्लांट खराब होता है, तो कोई सरकारी मैकेनिक इसे देखने नहीं आता। गांव के गरीब आदिवासी परिवार आपस में चंदा इकट्ठा करते हैं और खुद श्रमदान कर इसकी मरम्मत कराते हैं। बिजली न होने के कारण सबसे बुरा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है। ढिबरी या खराब सोलर लाइट के भरोसे बच्चे रात में पढ़ाई नहीं कर पाते। गांव में बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा के लिए एक आंगनबाड़ी केंद्र तक उपलब्ध नहीं है।
प्रशासनिक बेरुखी से ग्रामीणों में आक्रोश
ग्रामीणों का कहना है कि आज तक कोई भी प्रशासनिक अधिकारी या जनप्रतिनिधि उनके गांव की सुध लेने नहीं आया है। अधिकारियों की इसी बेरुखी के कारण गांव आज भी आदिम युग जैसी परिस्थितियों में जीने को मजबूर है। थके-हारे ग्रामीणों ने अब गुमला उपायुक्त से सामूहिक रूप से गुहार लगाई है कि गेतुपानी गांव को जल्द से जल्द जलमीनार, पक्की सड़क, आंगनबाड़ी केंद्र और सरकारी बिजली सेवा से जोड़ा जाए ताकि उन्हें भी एक सम्मानजनक और स्वस्थ जीवन मिल सके।





