
Jharkhand झारखंड : पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने शुक्रवार को कांग्रेस पार्टी पर तीखा हमला बोलते हुए उसे “आदिवासी विरोधी” बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में आदिवासियों की वर्तमान स्थिति के लिए कांग्रेस जिम्मेदार रही है और लंबे समय से पार्टी ने आदिवासी हितों की अनदेखी की है।
यह बयान उन्होंने टाटानगर रेलवे स्टेशन पर उस समय दिया, जब वे आदिवासी कलाकारों के एक समूह को विदा कर रहे थे। यह समूह 24 मई से दिल्ली में होने वाले ‘जनजातीय सांस्कृतिक समागम’ में भाग लेने के लिए रवाना हो रहा था। इस कार्यक्रम का आयोजन ‘जनजातीय सुरक्षा मंच’ द्वारा किया जा रहा है, जिसमें देशभर से आदिवासी समुदाय के लोग हिस्सा ले रहे हैं।
कार्यक्रम से जुड़ी जानकारी साझा करते हुए चंपई सोरेन ने कहा कि यह आयोजन आदिवासी संस्कृति, परंपरा और अधिकारों को राष्ट्रीय स्तर पर एक मंच देने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजनों से आदिवासी समाज की पहचान और मुद्दों को मजबूती मिलती है।
इसी दौरान उन्होंने कांग्रेस पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए। चंपई सोरेन, जो भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं, ने कहा कि झारखंड आंदोलन के दौरान कांग्रेस सरकार ने आदिवासियों और अन्य मूलनिवासी समुदायों पर लाठीचार्ज और गोलीबारी जैसी कार्रवाई का आदेश दिया था। उनके अनुसार, यह घटनाएं आदिवासी समुदाय के साथ अन्याय का उदाहरण हैं।
उन्होंने यह भी दावा किया कि उस समय की कांग्रेस सरकार ने 1961 की जनगणना से आदिवासी धर्म कोड को हटा दिया था, जबकि यह व्यवस्था ब्रिटिश काल से मौजूद थी। उनके अनुसार यह कदम आदिवासी पहचान को कमजोर करने की दिशा में उठाया गया था।
पूर्व मुख्यमंत्री ने पूर्व सांसद कार्तिक उरांव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 1967 में संसद में कार्तिक उरांव ने एक प्रस्ताव रखा था, जिसमें धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणी से बाहर करने की मांग की गई थी, ताकि आरक्षण का लाभ केवल वास्तविक पात्र लोगों को ही मिल सके।
चंपई सोरेन के इन बयानों के बाद राजनीतिक हलकों में फिर से आदिवासी मुद्दों को लेकर बहस तेज हो गई है। हालांकि कांग्रेस की ओर से इस पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि झारखंड और आसपास के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में ऐसे बयान आगामी राजनीतिक माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं, जनजातीय समुदाय से जुड़े संगठनों के बीच भी इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है।
कुल मिलाकर, चंपई सोरेन के इस बयान ने राज्य की राजनीति में एक बार फिर आदिवासी अधिकारों और ऐतिहासिक नीतियों को केंद्र में ला दिया है, जिससे आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस और तेज होने की उम्मीद है।





