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Rnchi रांची। झारखंड के आदिवासी बहुल इलाकों में इन दिनों पारंपरिक “बाहा परब” की धूम है। संथाल आदिवासी समाज का यह प्रमुख त्योहार प्रकृति, फूलों और सामुदायिक उत्सव की अनूठी परंपराओं से जुड़ा हुआ है। फागुन महीने की पांचवीं तिथि से शुरू होने वाला यह पर्व अलग-अलग गांवों में पूरे महीने तक मनाया जाता है और इसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं।
झारखंड के ग्रामीण इलाकों के अलावा देश के विभिन्न राज्यों में बसे संथाल समुदाय के लोग भी इस पर्व को उत्साह के साथ मनाते हैं। भारत के बाहर नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, भूटान और अमेरिका में रहने वाले संथाल समाज के बीच भी बाहा पर्व पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जाता है। संथाली भाषा में ‘बाहा’ का अर्थ 'फूलों का पर्व' होता है। यह पर्व कई मायनों में होली की तरह सामाजिक मेल-जोल और उत्साह का प्रतीक माना जाता है, हालांकि इसमें रंगों की जगह एक-दूसरे पर पानी और फूलों की वर्षा करने की परंपरा है।
इस अवसर पर संथाल समाज के लोग तीर-धनुष की पूजा करते हैं, ढोल-नगाड़ों और मांदर की थाप पर पारंपरिक नृत्य करते हैं और सामूहिक रूप से उत्सव मनाते हैं। इसी क्रम में गुरुवार को झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन रामगढ़ जिला स्थित अपने पैतृक गांव नेमरा में आयोजित “बाहा परब” में शामिल हुए। उन्होंने गांव के “जाहेर थान” (पूजा स्थल) में पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ पूजा-अर्चना कर राज्य के लोगों की सुख-समृद्धि, खुशहाली और उन्नति की कामना की।
मुख्यमंत्री ग्रामीणों के साथ अपने आवास से पदयात्रा करते हुए जाहेर थान पहुंचे, जहां संथाल परंपरा के अनुसार पूजा-अनुष्ठान संपन्न कराया गया। धार्मिक अनुष्ठान गांव के नाइके (पाहन) चैतन टुडू और कुडम नाइके (उप पाहन) छोटू बेसरा ने पारंपरिक विधि-विधान से संपन्न कराया। मुख्यमंत्री के गांव पहुंचने पर नेमरा और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में ग्रामीण एकत्र हुए। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप के साथ ग्रामीण जुलूस के रूप में जाहेर थान पहुंचे।
इस दौरान मुख्यमंत्री ने भी मांदर बजाकर उत्सव में भागीदारी की और ग्रामीणों का उत्साह बढ़ाया। संथाल समाज में बाहा पर्व का विशेष सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। पूजा-अनुष्ठान कराने वाले को ‘नाइकी बाबा’ कहा जाता है, जो पूजा के बाद सखुआ, महुआ और साल के फूल प्रसाद के रूप में वितरित करते हैं। इसी पर्व के साथ संथाल समाज में विवाह समारोहों का सिलसिला भी शुरू होता है। कुछ क्षेत्रों में बाहा के बाद पारंपरिक शिकार और सामूहिक भोज की भी परंपरा निभाई जाती है।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने राज्यवासियों को बाहा पर्व की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह पर्व प्रकृति, संस्कृति और सामुदायिक जीवन की समृद्ध परंपराओं का प्रतीक है।
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