
हजारीबाग। सावन का महीना शुरू होते ही झारखंड के हजारीबाग जिले के बड़कागांव इलाके के बाजारों में एक खास प्राकृतिक मशरूम की मांग तेजी से बढ़ गई है। स्थानीय भाषा में इसे ‘फुटका’ या ‘रुगड़ा’ कहा जाता है, जबकि स्वाद और बनावट के कारण इसे झारखंड में ‘बरसाती मटन’ के नाम से भी जाना जाता है। बारिश के मौसम में जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला यह मशरूम न केवल स्वाद के लिए पसंद किया जाता है, बल्कि कई ग्रामीण परिवारों के लिए कमाई का बड़ा साधन भी बन गया है। खास बात यह है कि इसके संग्रह और बिक्री से बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं।
बाजारों में बढ़ी फुटका की मांग
सावन शुरू होते ही बड़कागांव के दैनिक और साप्ताहिक बाजारों में फुटका, खुखड़ी और टेकनस की बिक्री तेज हो गई है। ग्रामीण सुबह-सुबह जंगलों में जाकर इन्हें चुनकर लाते हैं और दोपहर बाद बाजार में बेचते हैं। अंबा टोला के ग्रामीणों के अनुसार, वे सुबह जंगलों की ओर निकल जाते हैं और दोपहर तक फुटका, खुखड़ी और टेकनस इकट्ठा कर लेते हैं। इसके बाद बाजार में बिक्री शुरू करते हैं। कई लोग इस व्यवसाय से रोजाना अच्छी आमदनी कर रहे हैं। बाजार में फुटका करीब 1000 रुपये प्रति किलो, खुखड़ी 125 रुपये प्रति किलो और टेकनस करीब 225 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। इसका कारोबार जून से शुरू होकर सितंबर तक चलता है। सावन के दौरान इसकी मांग सबसे ज्यादा बढ़ जाती है।
शाकाहारियों का ‘मटन’ बना फुटका
फुटका का स्वाद और बनावट काफी अलग होती है। इसे खाने वाले लोग बताते हैं कि इसका स्वाद मटन जैसा महसूस होता है, इसलिए इसे शाकाहारियों का मटन भी कहा जाता है। सावन में कई लोग मांसाहार से दूरी बनाते हैं, ऐसे में फुटका उनके लिए पसंदीदा विकल्प बन जाता है। इसे लोग रोटी, पराठे और अन्य व्यंजनों के साथ बड़े चाव से खाते हैं।
आयुर्वेद विशेषज्ञ ने बताए फायदे
बड़कागांव के आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. अरुण महतो के अनुसार, रुगड़ा या फुटका स्वाद के साथ-साथ पोषण से भी भरपूर होता है। इसमें विटामिन बी-12, विटामिन बी-3, विटामिन सी, फॉस्फोरस, पोटेशियम, जिंक, आयरन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, फोलिक एसिड, कैल्शियम और प्रोटीन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि मानसून के मौसम में इसका सेवन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद कर सकता है। इसमें मौजूद पोषक तत्व शरीर के लिए लाभकारी माने जाते हैं।
साल के पेड़ों के नीचे उगता है यह प्राकृतिक मशरूम
फुटका की खासियत यह है कि यह आम मशरूम की तरह जमीन के ऊपर नहीं उगता, बल्कि जमीन के अंदर विकसित होता है। यह मुख्य रूप से साल यानी सखुआ के पेड़ों के नीचे पाया जाता है। कांड़तरी वन संरक्षण समिति के पूर्व अध्यक्ष बालेश्वर महतो ने बताया कि बारिश के मौसम में जब जंगलों में बिजली कड़कती है और साल के पेड़ों के नीचे की जमीन में नमी बढ़ती है, तब फुटका निकलना शुरू होता है। ग्रामीण जमीन खोदकर इसे सावधानी से बाहर निकालते हैं।
इन जंगलों में होता है उत्पादन
बड़कागांव क्षेत्र के कई जंगलों और पहाड़ी इलाकों में फुटका का उत्पादन अधिक होता है। डूमारो जंगल, महुदी पहाड़, बथनिया, चिनरीटांड़, सीकरी जंगल, जोराकाठ, बरवानिया, लौकुरा, भुरकुंडवा और पंकरी बरवाडीह जैसे क्षेत्रों से ग्रामीण बड़ी मात्रा में फुटका इकट्ठा करते हैं।
यहां से फुटका स्थानीय बाजारों के अलावा झारखंड के दूसरे शहरों में भी भेजा जाता है। बारिश के मौसम में मिलने वाला यह प्राकृतिक मशरूम जहां लोगों के स्वाद को बढ़ा रहा है, वहीं ग्रामीणों के लिए रोजगार और आय का महत्वपूर्ण जरिया भी बन गया है।





