झारखंड

82 साल बाद भी अधूरा हवाई अड्डे का सपना

Kavita2
12 Aug 2026 10:11 AM IST
82 साल बाद भी अधूरा हवाई अड्डे का सपना
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हजारीबाग : हवाई अड्डा निर्माण का सपना आठ दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी धरातल पर साकार नहीं हो सका है। वर्ष 1944 में नगवां गांव में हवाई अड्डा बनाने की पहल शुरू हुई थी। इसके लिए ग्रामीणों की करीब 39 एकड़ जमीन लिए जाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। बाद में भूमि अधिग्रहण को लेकर प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई भी हुई, लेकिन वर्षों बीतने के बावजूद न तो हवाई अड्डे का निर्माण पूरा हो सका और न ही सभी प्रभावित रैयतों को उनकी जमीन का मुआवजा मिलने का दावा समाप्त हुआ।

ग्रामीणों के अनुसार, हवाई अड्डा निर्माण के लिए नगवां गांव की जमीन को चिन्हित किए जाने के बाद अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ी। वर्ष 1954 में भूमि अधिग्रहण को लेकर कई रैयतों को नोटिस जारी किए गए। नोटिस में जमीन अधिग्रहण के एवज में मुआवजा दिए जाने की बात कही गई थी। उस समय ग्रामीणों को उम्मीद थी कि जमीन का उचित मुआवजा मिलने के साथ क्षेत्र में हवाई अड्डे का निर्माण भी जल्द शुरू होगा। हालांकि, समय बीतता गया और परियोजना पूरी नहीं हो सकी।

स्थानीय रैयतों का दावा है कि अधिग्रहण की प्रक्रिया के दौरान कई लोगों की जमीन सरकारी अभिलेखों में चली गई, लेकिन उन्हें आज तक मुआवजे की राशि नहीं मिल पाई है। इससे संबंधित परिवारों में वर्षों से असंतोष बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि कई पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन जमीन के बदले मिलने वाला हक अब भी लंबित है। जिन परिवारों के पूर्वजों को भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया का सामना करना पड़ा था, उनके उत्तराधिकारी आज भी इस मामले के समाधान की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

ग्रामीणों के मुताबिक, उस दौर में हवाई अड्डा बनने की चर्चा ने नगवां और आसपास के क्षेत्रों के लोगों में विकास की बड़ी उम्मीद जगाई थी। हवाई सेवा शुरू होने से हजारीबाग को देश के दूसरे बड़े शहरों से सीधी कनेक्टिविटी मिलने की संभावना थी। इससे व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और रोजगार के क्षेत्र में भी विकास की उम्मीद जताई गई थी। लेकिन परियोजना आगे नहीं बढ़ने से यह सपना अधूरा रह गया।

हवाई अड्डे के लिए जमीन अधिग्रहण का मामला भी समय के साथ जटिल होता गया। पुराने दस्तावेजों और भूमि अभिलेखों से जुड़े मामलों के कारण रैयतों के लिए अपने दावे को साबित करना आसान नहीं रहा। ग्रामीणों का कहना है कि यदि उस समय जमीन ली गई थी तो संबंधित रैयतों को मुआवजा मिलना चाहिए था। उनका यह भी कहना है कि लंबे समय से लंबित मामले की प्रशासनिक स्तर पर समीक्षा कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।

नगवां के ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ जमीन और मुआवजे का मामला नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों से जुड़ा अधिकार भी है। रैयतों का कहना है कि अधिग्रहण के समय जिन लोगों को जमीन देने के लिए कहा गया था, उन्होंने सरकारी प्रक्रिया पर भरोसा किया। कई परिवारों ने अपनी जमीन गंवाई, लेकिन बदले में उन्हें अपेक्षित मुआवजा नहीं मिला। ऐसे में अब प्रशासन को पुराने रिकॉर्ड की जांच कर प्रत्येक प्रभावित परिवार की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

स्थानीय लोगों का कहना है कि 1944 में शुरू हुई पहल और 1954 में जारी किए गए अधिग्रहण संबंधी नोटिस इस परियोजना के लंबे इतिहास को दर्शाते हैं। इसके बावजूद आठ दशक से अधिक समय में हवाई अड्डे का सपना पूरा नहीं होना क्षेत्र के लिए निराशाजनक है। ग्रामीणों की मांग है कि सरकार पुराने भूमि अधिग्रहण मामले की व्यापक जांच कराए और यह पता लगाए कि कितनी जमीन वास्तव में अधिग्रहित हुई, कितने रैयतों को मुआवजा दिया गया और कितने मामलों में भुगतान अब भी लंबित है।

रैयतों का कहना है कि प्रशासन यदि पुराने दस्तावेजों, खतियान, अधिग्रहण संबंधी नोटिस और भुगतान अभिलेखों की जांच करे तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। इसके बाद पात्र रैयतों या उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को नियमानुसार मुआवजा उपलब्ध कराने की दिशा में कार्रवाई की जा सकती है।

हजारीबाग में हवाई संपर्क को लेकर समय-समय पर उम्मीदें जगती रही हैं, लेकिन नगवां में प्रस्तावित हवाई अड्डे का पुराना इतिहास बताता है कि यह सपना नया नहीं है। करीब 82 वर्ष पहले जिस योजना ने क्षेत्र के विकास की उम्मीद जगाई थी, वह आज भी अधूरी कहानी बनी हुई है। वहीं, जमीन देने वाले कई परिवारों के लिए यह कहानी केवल विकास की प्रतीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि मुआवजे और न्याय के इंतजार से भी जुड़ी हुई है।

अब जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग पुराने भूमि अधिग्रहण रिकॉर्ड को खंगाले और नगवां के रैयतों के दावों की तथ्यात्मक जांच करे। यदि मुआवजा लंबित पाया जाता है तो प्रभावित परिवारों को नियमानुसार भुगतान दिलाने की प्रक्रिया शुरू हो। इससे वर्षों से चले आ रहे विवाद का समाधान हो सकेगा और 1944 में शुरू हुई हवाई अड्डे की पहल के इतिहास को भी उचित रूप से दर्ज किया जा सकेगा।

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