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बंद कोयला खदानों की मीथेन बनेगी ऊर्जा का स्रोत, ग्लोबल वार्मिंग कम करने पर मंथन
रांची : झारखंड की राजधानी रांची में ऊर्जा, पर्यावरण और खनन क्षेत्र के विशेषज्ञों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें बंद कोयला खदानों से निकलने वाली मीथेन गैस के प्रभावी उपयोग पर विस्तृत चर्चा हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परित्यक्त (बंद) खदानों से निकलने वाली मीथेन गैस को वैज्ञानिक तरीके से एकत्र कर ऊर्जा उत्पादन में इस्तेमाल किया जाए, तो इससे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आएगी और ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करने में मदद मिलेगी।
बैठक में ऊर्जा विशेषज्ञों, खनन इंजीनियरों, पर्यावरण वैज्ञानिकों, सरकारी अधिकारियों और उद्योग प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत में बड़ी संख्या में बंद हो चुकी कोयला खदानें ऐसी हैं, जहां से वर्षों तक मीथेन गैस का उत्सर्जन होता रहता है। यदि इस गैस को बिना उपयोग के वातावरण में जाने दिया जाता है, तो यह जलवायु परिवर्तन की समस्या को और गंभीर बना सकती है।
मीथेन क्यों है चिंता का विषय?
विशेषज्ञों ने बताया कि मीथेन (Methane) एक अत्यधिक प्रभावशाली ग्रीनहाउस गैस है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, कम अवधि में इसकी ताप को रोकने की क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) से कई गुना अधिक होती है। यही कारण है कि मीथेन के उत्सर्जन को कम करना जलवायु परिवर्तन से निपटने की वैश्विक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
बंद कोयला खदानों में लंबे समय तक जमा रहने वाली यह गैस धीरे-धीरे वातावरण में निकलती रहती है। यदि इसे नियंत्रित कर ऊर्जा उत्पादन में लगाया जाए, तो एक ओर स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत मिलेगा और दूसरी ओर पर्यावरण को होने वाले नुकसान में कमी आएगी।
ऊर्जा उत्पादन का नया स्रोत
बैठक में विशेषज्ञों ने बताया कि बंद खदानों से निकलने वाली मीथेन गैस का उपयोग बिजली उत्पादन, औद्योगिक ईंधन और गैस आधारित ऊर्जा परियोजनाओं में किया जा सकता है। कई देशों में इस तकनीक का सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है और भारत में भी इसके विस्तार की पर्याप्त संभावनाएं हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस दिशा में प्रभावी नीति बनाई जाती है, तो इससे ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कुछ हद तक कम की जा सकेगी।
झारखंड के लिए बड़ा अवसर
झारखंड देश के प्रमुख कोयला उत्पादक राज्यों में शामिल है। यहां बड़ी संख्या में सक्रिय और बंद दोनों प्रकार की खदानें मौजूद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन बंद खदानों से निकलने वाली मीथेन का वैज्ञानिक दोहन राज्य के लिए आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टि से लाभकारी हो सकता है।
इससे ऊर्जा क्षेत्र में निवेश बढ़ने, नई परियोजनाओं के विकास और रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना भी है। साथ ही खनन क्षेत्रों में आधुनिक तकनीक के उपयोग को बढ़ावा मिलेगा।
पर्यावरण संरक्षण पर जोर
बैठक में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि ऊर्जा विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। मीथेन गैस को नियंत्रित कर उपयोग में लाने से न केवल ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होगा, बल्कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े वैश्विक लक्ष्यों को हासिल करने में भी मदद मिलेगी।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि बंद खदानों का नियमित सर्वेक्षण किया जाए, गैस उत्सर्जन की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक अपनाई जाए और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से ऐसी परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जाए।
भविष्य की रणनीति पर चर्चा
बैठक में यह भी विचार किया गया कि केंद्र और राज्य सरकारों, सार्वजनिक उपक्रमों, अनुसंधान संस्थानों और निजी कंपनियों के बीच समन्वय बढ़ाकर बंद खदानों से मीथेन गैस के उपयोग की परियोजनाओं को गति दी जा सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम उठाए गए, तो भारत स्वच्छ ऊर्जा, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर सकता है।
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