झारखंड

झारखंड में माओवाद के खिलाफ 26 साल की लड़ाई, 600 से अधिक जवान-अधिकारी हुए बलिदान

Kavita2
26 Sept 2026 5:27 PM IST
झारखंड में माओवाद के खिलाफ 26 साल की लड़ाई, 600 से अधिक जवान-अधिकारी हुए बलिदान
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रांची। झारखंड में लंबे समय से चली आ रही माओवादी हिंसा के खिलाफ सुरक्षा बलों के अभियान ने महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किया है। अलग राज्य बनने के बाद करीब 26 वर्षों तक माओवाद की समस्या से जूझे झारखंड में सुरक्षा बलों ने लगातार अभियान चलाकर माओवादी संगठनों के प्रभाव को कमजोर किया। इस लंबे संघर्ष के दौरान झारखंड पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के 600 से अधिक जवानों एवं अधिकारियों ने बलिदान दिया। वहीं बड़ी संख्या में माओवादी मारे गए, गिरफ्तार हुए या उन्होंने आत्मसमर्पण किया।

झारखंड का गठन 15 नवंबर 2000 को हुआ था। राज्य बनने के समय से ही इसके कई जिले माओवादी गतिविधियों से प्रभावित थे। घने जंगल, पहाड़ी इलाके और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती थीं। कई इलाकों में माओवादी संगठनों का मजबूत नेटवर्क था और सुरक्षा बलों को अभियान चलाने में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था।

करीब 26 वर्षों के दौरान झारखंड पुलिस और केंद्रीय बलों ने माओवादियों के खिलाफ लगातार अभियान चलाए। इस दौरान सुरक्षा बलों को बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी। अभियान में 600 से अधिक पुलिसकर्मियों, जवानों और अधिकारियों ने अपनी जान गंवाई। कई बड़े माओवादी हमलों में सुरक्षा बलों को नुकसान हुआ, लेकिन इसके बावजूद अभियान लगातार जारी रखा गया।

माओवाद विरोधी अभियानों के दौरान सैकड़ों माओवादी भी मारे गए। बड़ी संख्या में माओवादियों को पुलिस और सुरक्षा बलों ने गिरफ्तार किया, जबकि कई ने सरकार की आत्मसमर्पण नीति के तहत हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का रास्ता चुना। लगातार कार्रवाई के कारण माओवादी संगठनों के कई प्रमुख नेटवर्क कमजोर होते चले गए।

सुरक्षा बलों की कार्रवाई में माओवादियों के पास से बड़ी संख्या में हथियार भी बरामद किए गए। पिछले 26 वर्षों में माओवादियों से कुल 682 अत्याधुनिक हथियार बरामद किए जाने की बात सामने आई है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे हथियारों की थी, जिन्हें माओवादियों ने अलग-अलग घटनाओं के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों से लूटा था।

इन हथियारों की बरामदगी सुरक्षा बलों के लिए महत्वपूर्ण रही, क्योंकि माओवादी संगठन पुलिस और सुरक्षाबलों से लूटे गए हथियारों का इस्तेमाल आगे की हिंसक घटनाओं में करते थे। लगातार अभियान के दौरान ऐसे हथियारों की बरामदगी से माओवादी संगठनों की सशस्त्र क्षमता को कमजोर करने में मदद मिली।

झारखंड में माओवाद की समस्या लंबे समय तक राज्य की आंतरिक सुरक्षा की प्रमुख चुनौतियों में शामिल रही। राज्य के कई हिस्सों में माओवादी संगठनों की गतिविधियों के कारण सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ। पुलिस और सुरक्षा बलों को जंगलों एवं दूर-दराज के क्षेत्रों में विशेष अभियान चलाने पड़े। कई बार माओवादियों ने सुरक्षा बलों को निशाना बनाने के लिए बारूदी सुरंगों और आईईडी का इस्तेमाल भी किया।

समय के साथ सुरक्षा बलों ने अपनी रणनीति में बदलाव किया। माओवाद प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ाई गई और लगातार तलाशी एवं अभियान चलाए गए। माओवादी संगठनों के शीर्ष नेताओं और सक्रिय सदस्यों पर कार्रवाई के साथ उनके नेटवर्क को तोड़ने पर ध्यान दिया गया।

पुलिस और केंद्रीय बलों के संयुक्त अभियानों ने भी माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राज्य के दुर्गम इलाकों में सुरक्षा बलों की पहुंच बढ़ने के साथ माओवादी संगठनों के लिए पहले की तरह गतिविधियां संचालित करना मुश्किल होता गया। गिरफ्तारी, आत्मसमर्पण और मुठभेड़ों में मारे जाने के कारण उनकी संख्या में लगातार कमी आई।

सुरक्षा अभियानों के साथ माओवादियों को आत्मसमर्पण के लिए प्रोत्साहित करने की नीति भी अपनाई गई। इसके तहत हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले माओवादियों के लिए पुनर्वास की व्यवस्था की गई। इसका असर भी देखने को मिला और विभिन्न स्तर के कई माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया।

झारखंड पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में माओवादियों के सुरक्षित ठिकानों तक पहुंचना शामिल था। जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में बनाए गए ठिकानों से माओवादी अपनी गतिविधियां संचालित करते थे। सुरक्षा बलों ने ऐसे इलाकों में अभियान चलाकर उनके ठिकानों और नेटवर्क को निशाना बनाया।

माओवाद के खिलाफ इस लंबे अभियान में स्थानीय पुलिस के साथ केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। अलग-अलग अभियानों में खुफिया सूचनाओं के आधार पर कार्रवाई की गई। कई प्रमुख माओवादी नेताओं की गिरफ्तारी और आत्मसमर्पण से संगठनों की कमान और संचालन क्षमता प्रभावित हुई।

करीब ढाई दशक की इस लड़ाई में माओवादी हिंसा से आम नागरिकों को भी नुकसान उठाना पड़ा। विभिन्न घटनाओं में ग्रामीण और अन्य नागरिक मारे गए। माओवादी गतिविधियों के कारण प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों और सामान्य प्रशासन के सामने भी लंबे समय तक चुनौतियां बनी रहीं।

अब राज्य में माओवादी गतिविधियों में आई बड़ी कमी को सुरक्षा बलों के लंबे अभियान की महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि सुरक्षा एजेंसियां किसी भी संभावित गतिविधि को लेकर निगरानी और सतर्कता बनाए हुए हैं।

झारखंड में माओवाद के खिलाफ करीब 26 वर्षों का यह अभियान सुरक्षा बलों के बलिदान, लगातार कार्रवाई और माओवादी नेटवर्क को कमजोर करने के प्रयासों से जुड़ा रहा है। 600 से अधिक जवानों और अधिकारियों के बलिदान, सैकड़ों माओवादियों के मारे जाने, बड़ी संख्या में गिरफ्तारी और आत्मसमर्पण तथा 682 अत्याधुनिक हथियारों की बरामदगी के बाद राज्य में माओवादी प्रभाव में भारी कमी आई है।

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