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गढ़वा में 50% सब्सिडी के सहारे दलहन उत्पादन बढ़ाने की तैयारी, मूंग और अरहर की खेती से किसानों की बढ़ेगी आय
Jharkhand: झारखंड के गढ़वा जिले में किसानों की आय बढ़ाने और दलहन उत्पादन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से कृषि विभाग ने विशेष अभियान शुरू किया है। इस पहल के तहत किसानों को मूंग और अरहर के उन्नत बीज 50 प्रतिशत सब्सिडी पर उपलब्ध कराए जाएंगे। सरकार का लक्ष्य जिले में दलहन की खेती का रकबा बढ़ाना, मिट्टी की उर्वरता में सुधार करना और किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ लाभदायक विकल्प उपलब्ध कराना है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि दलहन फसलें न केवल किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ देती हैं, बल्कि मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर भूमि की उत्पादकता भी सुधारती हैं। ऐसे में यह पहल खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
कृषि विभाग ने किसानों को प्रमाणित और उन्नत किस्म के बीज उपलब्ध कराने की योजना बनाई है। बीजों पर 50 प्रतिशत अनुदान (सब्सिडी) दिए जाने से किसानों की लागत कम होगी और अधिक से अधिक किसान दलहन की खेती की ओर आकर्षित होंगे।
योजना के तहत पात्र किसानों को निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से बीज वितरित किए जाएंगे। विभाग ने किसानों से समय पर आवेदन करने और कृषि कार्यालय से संपर्क कर योजना का लाभ लेने की अपील की है।
मूंग और अरहर की खेती पर विशेष फोकस
इस अभियान में विशेष रूप से मूंग और अरहर की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। दोनों फसलें कम लागत में अच्छी आय देने वाली मानी जाती हैं।
मूंग की खेती के लाभ
कम अवधि में तैयार होने वाली फसल।
कम पानी की आवश्यकता।
बाजार में अच्छी मांग।
फसल चक्र में आसानी से शामिल की जा सकती है।
मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायक।
अरहर की खेती के फायदे
लंबी अवधि की लाभदायक दलहन फसल।
बेहतर बाजार मूल्य मिलने की संभावना।
सूखा सहन करने की क्षमता।
भूमि की गुणवत्ता में सुधार।
पशुओं के लिए उपयोगी अवशेष।
किसानों की आय बढ़ाने पर सरकार का जोर
कृषि विभाग का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि करना है। दलहन फसलों की बाजार में लगातार मांग बनी रहती है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलने की संभावना रहती है।
यदि किसान आधुनिक तकनीक, उन्नत बीज और वैज्ञानिक खेती अपनाते हैं, तो प्रति एकड़ उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। इससे उनकी लागत घटेगी और मुनाफा बढ़ेगा।
मिट्टी की सेहत सुधरेगी
दलहन फसलें मिट्टी के लिए अत्यंत लाभकारी मानी जाती हैं। इनके पौधों की जड़ों में मौजूद जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करने का काम करते हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और अगली फसलों को भी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि धान और गेहूं के साथ दलहन फसलों को फसल चक्र में शामिल करने से भूमि की उत्पादकता लंबे समय तक बनी रहती है।
किसानों को मिलेगा तकनीकी मार्गदर्शन
बीज वितरण के साथ-साथ कृषि विभाग किसानों को वैज्ञानिक खेती के तरीके भी बताएगा। इसमें शामिल होंगे—
उन्नत बीजों का चयन।
समय पर बुआई।
संतुलित उर्वरक प्रबंधन।
खरपतवार नियंत्रण।
कीट एवं रोग प्रबंधन।
सिंचाई का उचित प्रबंधन।
कटाई और भंडारण की आधुनिक तकनीक।
कृषि वैज्ञानिक और विभागीय अधिकारी समय-समय पर किसानों को प्रशिक्षण भी देंगे, ताकि उन्हें अधिक उत्पादन प्राप्त हो सके।
आत्मनिर्भर दलहन उत्पादन की दिशा में कदम
देश में दलहन की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है। गढ़वा जैसे कृषि प्रधान जिले में यदि बड़े पैमाने पर मूंग और अरहर की खेती बढ़ती है, तो इसका लाभ किसानों के साथ-साथ स्थानीय बाजार और उपभोक्ताओं को भी मिलेगा।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा बल
दलहन उत्पादन बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। बीज, खाद, कृषि उपकरण, परिवहन और विपणन से जुड़े लोगों को भी रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
किसानों से योजना का लाभ लेने की अपील
कृषि विभाग ने पात्र किसानों से अपील की है कि वे समय पर आवेदन कर 50 प्रतिशत सब्सिडी वाली इस योजना का लाभ उठाएं। विभाग का कहना है कि उन्नत बीज, वैज्ञानिक खेती और सरकारी सहायता के माध्यम से किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
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