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जम्मू और कश्मीर
लेह की धरती पर उगेगा दुनिया का महंगा मसाला? केसर ने जगाई नई उम्मीद
nidhi
3 Oct 2026 11:52 AM IST

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लेह में केसर की तैयारी
लेह: सेब और खुबानी के लिए पहचान बनाने वाला लद्दाख अब दुनिया के सबसे महंगे मसालों में शामिल केसर की खेती की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ‘रेड गोल्ड’ यानी लाल सोना कहे जाने वाले केसर का नाम भारत में सबसे पहले कश्मीर से जुड़ता है। अब लेह की जलवायु और जमीन में इसकी खेती की संभावनाओं को लेकर प्रयोग किए जा रहे हैं। अगर प्रयास सफल रहते हैं तो लद्दाख के किसानों के लिए आय का एक नया और मूल्यवान विकल्प तैयार हो सकता है।
कश्मीर का केसर अपनी खुशबू, रंग और गुणवत्ता के कारण दुनियाभर में प्रसिद्ध है। विशेष रूप से पंपोर और आसपास के क्षेत्र लंबे समय से केसर उत्पादन के लिए जाने जाते हैं। इसकी खेती बेहद मेहनत और सावधानी मांगती है। कम उत्पादन और अधिक मांग के कारण केसर की कीमत काफी ऊंची रहती है, जिसके चलते इसे ‘रेड गोल्ड’ कहा जाता है। लद्दाख की जलवायु सामान्य खेती के लिए चुनौतीपूर्ण मानी जाती है। ऊंचाई, कम बारिश, सर्द मौसम और सीमित कृषि भूमि के बावजूद यहां किसान सेब, खुबानी और दूसरी फसलों की खेती करते हैं। अब इसी वातावरण में केसर उगाने की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है।
केसर की खेती के लिए मौसम और मिट्टी दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पौधे को ऐसी जमीन चाहिए जहां पानी लंबे समय तक जमा न रहे। अत्यधिक नमी इसकी फसल को नुकसान पहुंचा सकती है। लद्दाख के कई इलाकों में शुष्क परिस्थितियां होने के कारण वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर संभावनाएं बन सकती हैं।
हालांकि कुछ सफल पौधे या शुरुआती प्रयोग यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे कि लद्दाख तुरंत कश्मीर के बराबर केसर उत्पादक क्षेत्र बन जाएगा। बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए कई वर्षों तक पैदावार, गुणवत्ता, मिट्टी, तापमान और पानी की उपलब्धता का अध्ययन करना होगा।
अगर लेह और आसपास के क्षेत्रों में केसर की व्यावसायिक खेती सफल होती है तो इसका सबसे बड़ा फायदा स्थानीय किसानों को हो सकता है। केसर कम क्षेत्र में अधिक मूल्य देने वाली फसलों में गिना जाता है। इससे सीमित कृषि भूमि वाले किसानों को परंपरागत फसलों के साथ अतिरिक्त आमदनी का विकल्प मिल सकता है।
केसर का इस्तेमाल केवल खाने का स्वाद और रंग बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसका उपयोग मिठाइयों, पेय पदार्थों, सौंदर्य उत्पादों और पारंपरिक उत्पादों में भी किया जाता है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग के कारण अच्छी गुणवत्ता वाले केसर की कीमत ऊंची रहती है।
लद्दाख के लिए केसर की खेती पर्यटन से भी जुड़ सकती है। जिस तरह कश्मीर में केसर के खेत पर्यटकों के आकर्षण का हिस्सा बनते हैं, उसी तरह भविष्य में लेह में सफल खेती होने पर कृषि पर्यटन की नई संभावना विकसित हो सकती है।
इसके बावजूद कश्मीर और लद्दाख की तुलना अभी जल्दबाजी होगी। कश्मीर के पास केसर उत्पादन का लंबा अनुभव, पारंपरिक ज्ञान और स्थापित बाजार मौजूद है। लद्दाख अभी इसकी संभावनाओं को समझने और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप खेती का तरीका विकसित करने के चरण में है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में नई फसलों पर प्रयोग कृषि क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। अलग-अलग ऊंचाई और मौसम वाले क्षेत्रों में उच्च मूल्य वाली फसलों की संभावनाएं तलाशने से किसानों के लिए नए विकल्प खुल सकते हैं।
फिलहाल लद्दाख में केसर की खेती से जुड़ी संभावनाओं ने उत्सुकता बढ़ा दी है। यदि लेह के ठंडे और शुष्क वातावरण में ‘रेड गोल्ड’ की खेती बड़े स्तर पर सफल होती है तो सेब और खुबानी के बाद लद्दाख को एक और कीमती कृषि उत्पाद मिल सकता है। लेकिन कश्मीर से केसर का ताज छीनने जैसी स्थिति का आकलन वास्तविक उत्पादन और गुणवत्ता के आंकड़े सामने आने के बाद ही किया जा सकेगा।
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