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जम्मू और कश्मीर
सेब बागवानों पर मौसम की मार कई गांवों में 90 फीसदी तक नुकसान
nidhi
18 Aug 2026 8:50 AM IST

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शोपियां में ओलावृष्टि से सेब बागवानों को भारी नुकसान
श्रीनगर: कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सेब उद्योग को इस बार मौसम की मार ने बड़ा झटका दिया है। घाटी के कई इलाकों में हुई भारी ओलावृष्टि ने तैयार होने की ओर बढ़ रही सेब की फसल को नुकसान पहुंचाया है। कई बागों में फलों पर गहरे दाग और चोट के निशान पड़ गए हैं, जिससे उनकी बाजार में मिलने वाली कीमत और गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका है। कुछ प्रभावित गांवों में बागवानों ने 80 से 90 प्रतिशत तक नुकसान होने का दावा किया है।
सबसे अधिक चिंता दक्षिण कश्मीर के सेब उत्पादक क्षेत्रों में देखने को मिल रही है। शोपियां और आसपास के कई गांवों में ओलावृष्टि से बागों में लगे सेब क्षतिग्रस्त हुए हैं। स्थानीय बागवानों का कहना है कि फसल पर ऐसे समय ओलों की मार पड़ी जब सेब आकार ले चुके थे और अगले कुछ सप्ताह में उनकी तुड़ाई शुरू होने वाली थी। इस स्तर पर फल को लगी चोट को ठीक करना संभव नहीं होता और इसका सीधा असर उसकी ग्रेडिंग पर पड़ता है।
कश्मीर में सेब की कीमत काफी हद तक उसके आकार, रंग और बाहरी गुणवत्ता पर निर्भर करती है। अच्छे आकार और बिना दाग वाले सेब को उच्च श्रेणी में रखा जाता है और बाजार में बेहतर दाम मिलता है। ओलावृष्टि से फल की बाहरी सतह पर चोट लगने के बाद वही सेब निम्न ग्रेड में जा सकता है। इससे किसान को उत्पादन होने के बावजूद अपेक्षित आय नहीं मिल पाती।
कई बागवानों के सामने इस बार दोहरी परेशानी खड़ी हो गई है। एक तरफ तेज ओलों से कुछ फल पेड़ों से गिर गए, वहीं दूसरी ओर पेड़ों पर बचे फलों पर भी निशान पड़ गए हैं। ऐसे सेबों को प्रीमियम बाजार में बेचने में मुश्किल आ सकती है। बागवानों का कहना है कि उत्पादन लागत पहले ही बढ़ चुकी है और यदि बाजार में फसल की सही कीमत नहीं मिली तो उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा।
ओलावृष्टि के बाद प्रभावित क्षेत्रों में नुकसान के आकलन की मांग तेज हो गई है। किसानों और बागवान संगठनों ने प्रशासन से राजस्व, बागवानी और कृषि विभाग की संयुक्त टीमों को प्रभावित इलाकों में भेजने की मांग की है। उनका कहना है कि गांव और बाग के स्तर पर वास्तविक नुकसान का सर्वे किया जाना चाहिए ताकि किसानों को उचित राहत दी जा सके।
सबसे बड़ी मांग व्यापक फसल बीमा व्यवस्था को लेकर उठ रही है। कश्मीर के बागवान लंबे समय से सेब समेत बागवानी फसलों के लिए ऐसा बीमा कवच चाहते हैं जो ओलावृष्टि, तेज बारिश, तूफान, असमय बर्फबारी और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान की भरपाई कर सके। मौजूदा परिस्थितियों में एक मौसम की घटना किसान की पूरे साल की कमाई को प्रभावित कर सकती है।
बागवानों का तर्क है कि सेब की खेती सामान्य फसलों की तुलना में अधिक निवेश वाली होती है। पेड़ों की देखभाल, कीटनाशक, खाद, सिंचाई, मजदूरी, पैकिंग और परिवहन पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। यदि तुड़ाई से ठीक पहले ओलावृष्टि से फसल खराब हो जाए तो किसान के पास लागत निकालने तक का रास्ता मुश्किल हो जाता है। इसी कारण प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा देने वाली प्रभावी बीमा योजना की मांग लगातार बढ़ रही है।
कश्मीर का सेब उद्योग जम्मू-कश्मीर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लाखों लोगों की आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बागवानी से जुड़ी हुई है। बाग मालिकों के अलावा मजदूर, पैकेजिंग उद्योग, ट्रांसपोर्टर, मंडी कारोबारी और कोल्ड स्टोरेज कारोबार भी सेब उत्पादन पर निर्भर हैं। ऐसे में बड़े स्तर पर फसल को नुकसान होने का प्रभाव केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता। मौसम में लगातार हो रहे बदलाव ने भी बागवानों की चिंता बढ़ा दी है। कभी असमय बारिश, कभी तेज हवा और कभी ओलावृष्टि से फसल प्रभावित हो रही है। किसानों का कहना है कि बदलती जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए अब केवल नुकसान के बाद राहत देना पर्याप्त नहीं है। बागों को सुरक्षित करने के लिए एंटी हेल नेट, मौसम पूर्वानुमान प्रणाली और आधुनिक कृषि तकनीक तक किसानों की पहुंच बढ़ानी होगी।
एंटी हेल नेट ओलों से फलों को बचाने में उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन इन्हें बड़े बागों में लगाने की लागत काफी अधिक होती है। छोटे और सीमांत बागवानों के लिए यह खर्च उठाना आसान नहीं है। इसलिए किसान इन सुरक्षा उपायों पर सरकारी सहायता और सब्सिडी बढ़ाने की मांग भी कर रहे हैं। ओलावृष्टि के बाद अब किसानों की नजर प्रशासन के नुकसान आकलन और राहत संबंधी फैसलों पर है। यदि कुछ गांवों में 90 प्रतिशत तक नुकसान के दावे आधिकारिक सर्वे में सही पाए जाते हैं तो प्रभावित परिवारों के लिए तत्काल आर्थिक सहायता की जरूरत और बढ़ जाएगी।
कश्मीर के लाल और चमकदार सेब देशभर की मंडियों में अपनी गुणवत्ता के लिए पहचाने जाते हैं। इस बार ओलों की चोट ने कई बागों में इस चमक को फीका कर दिया है। किसानों के सामने अब फसल को बाजार तक पहुंचाने के साथ उसकी उचित कीमत हासिल करने की चुनौती है। वहीं इस प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि मौसम की बढ़ती अनिश्चितता के बीच कश्मीर के सेब उत्पादकों को मजबूत और व्यापक बीमा सुरक्षा कब मिलेगी।
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