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जम्मू और कश्मीर
बिजली परियोजनाओं पर जल शुल्क असंवैधानिक, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
Kiran
30 Oct 2026 8:52 AM IST

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श्रीनगर, केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन को एक बड़ा कानूनी झटका देते हुए, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने 'जम्मू-कश्मीर जल संसाधन (विनियमन और प्रबंधन) अधिनियम, 2010' के उन प्रावधानों को रद्द कर दिया है, जिनके तहत जल विद्युत परियोजनाओं पर 'जल उपयोग शुल्क' (water usage charges) लगाया जाता था। न्यायमूर्ति रजनीश ओसवाल और न्यायमूर्ति संजय धर की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि स्वतंत्र बिजली उत्पादकों पर जल उपयोग शुल्क लगाना, वास्तव में बिजली उत्पादन पर एक ऐसा कर लगाने के समान है जो लगाने की अनुमति नहीं है। यह केंद्र शासित प्रदेश की विधायिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
अदालत ने स्वतंत्र बिजली उत्पादकों - जिनमें 'मास एन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड', 'मैगपाई हाइडल कंस्ट्रक्शन ऑपरेशन इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड' और 'चौधरी पावर प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड' शामिल हैं - द्वारा दायर कई रिट याचिकाओं को स्वीकार कर लिया। साथ ही, 2010 से सरकार द्वारा जारी किए गए सभी संबंधित मांग नोटिसों (demand notices) को भी रद्द कर दिया। कंपनियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रणव कोहली (जम्मू), अधिवक्ता शारिक जे. रियाज़ और अन्य पेश हुए, जबकि राज्य/केंद्र शासित प्रदेश की ओर से वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता ए. आर. मलिक और उप सॉलिसिटर जनरल टी. एम. शम्सी ने पक्ष रखा।
मुख्य कानूनी मुद्दों पर विचार करते हुए, खंडपीठ ने कहा कि हालांकि संविधान की दूसरी सूची (List II) की प्रविष्टि 17 (Entry 17) के तहत राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की विधायिका को जल के संबंध में विनियामक शक्तियां प्राप्त हैं, लेकिन उन्हें बिजली उत्पादन पर कर लगाने का विधायी अधिकार नहीं है। शुल्क निर्धारण की प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए - जिसमें शुल्क की गणना पानी की वास्तविक मात्रा के बजाय 'हेड-हाइट' (ऊंचाई) और टर्बाइन के घूमने (propulsion) के आधार पर की जाती थी - अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि यह शुल्क असल में जल उपयोग के लिए कोई विनियामक शुल्क नहीं, बल्कि बिजली उत्पादन पर लगाया गया एक कर है।
अदालत ने प्रशासन के उस तर्क को भी खारिज कर दिया कि 'जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019' के माध्यम से 2010 के अधिनियम को संरक्षण मिला है और इसे संसदीय समर्थन प्राप्त है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए, खंडपीठ ने कहा कि जो कानून शुरुआत से ही असंवैधानिक और शून्य (void ab initio) माना गया हो, उसे बाद में संसद द्वारा अपनाए जाने से वैध नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने इन विवादित प्रावधानों को संविधान के विरुद्ध (ultra vires) घोषित किया और प्रशासन को निर्देश दिया कि वे भविष्य में 'जल उपयोग शुल्क' की आड़ में बिजली उत्पादन पर कोई कर न लगाएं। उच्च न्यायालय ने कहा, "विवादास्पद कानून, जहाँ तक यह याचिकाकर्ताओं पर पानी के इस्तेमाल का शुल्क लगाता है, संविधान के दायरे से बाहर (अल्ट्रा वायर्स) माना जाता है और इस हद तक इसे रद्द किया जाता है।" अदालत ने आगे कहा कि प्रशासन का आदेश, इस विवादास्पद कानून को बचाने के लिए "हताशा में की गई एक कोशिश" जैसा लगता है। अपने 50 पन्नों के आदेश में अदालत ने कहा, "अगर हम 'जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम' के प्रावधानों को देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इस अधिनियम के तहत कुछ राज्य कानूनों को सुरक्षित रखा गया है, जबकि कुछ अन्य कानूनों को निरस्त (रद्द) कर दिया गया है।"
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