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कश्मीर में सेब के बागों से उठ रहा जहरीला धुआं, हवा की गुणवत्ता बिगड़ी

Kavita2
7 Nov 2026 2:19 PM IST
कश्मीर में सेब के बागों से उठ रहा जहरीला धुआं, हवा की गुणवत्ता बिगड़ी
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श्रीनगर। दक्षिण कश्मीर में सेब की फसल का सीजन समाप्त होने के बाद बागों में पेड़ों की छंटाई का काम तेजी से शुरू हो गया है। इसके साथ ही छंटाई से निकलने वाली सूखी टहनियों और डालियों को जलाने का सिलसिला भी बढ़ गया है। बागों से उठने वाला धुआं आसपास के इलाकों में फैल रहा है, जिससे वायु प्रदूषण की समस्या गंभीर होती जा रही है। विशेष रूप से शोपियां, पुलवामा और कुलगाम जैसे प्रमुख सेब उत्पादक जिलों में शाम के समय धुएं की मोटी परत दिखाई दे रही है। इससे स्थानीय लोगों को सांस लेने में परेशानी हो रही है। अस्थमा और सांस संबंधी बीमारियों से पीड़ित बुजुर्गों तथा बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ गई है।

कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए प्रशासन से सुरक्षित निपटान के विकल्पों को बढ़ावा देने की मांग की है। विशेषज्ञों का कहना है कि पेड़ों की छंटाई जरूरी कृषि गतिविधि है, लेकिन इससे निकलने वाले अवशेषों को खुले में जलाना पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

सेब की कटाई खत्म होते ही शुरू हुई छंटाई

दक्षिण कश्मीर में सेब की खेती बड़ी संख्या में किसानों की आजीविका का महत्वपूर्ण साधन है। फसल का सीजन समाप्त होने के बाद किसान अगले उत्पादन चक्र की तैयारियों में जुट जाते हैं।

इसी प्रक्रिया के तहत सेब के पेड़ों की छंटाई की जाती है। इसमें सूखी, कमजोर और अनावश्यक शाखाओं को हटाया जाता है, ताकि पेड़ों का बेहतर विकास हो सके।

छंटाई के दौरान बड़ी मात्रा में टहनियां और डालियां निकलती हैं। कई किसान इन अवशेषों को बागों में ही इकट्ठा करके जला देते हैं।

इससे निकलने वाला धुआं आसपास के गांवों और रिहायशी इलाकों तक पहुंच सकता है।

शोपियां, पुलवामा और कुलगाम में धुएं की समस्या

दक्षिण कश्मीर के शोपियां, पुलवामा और कुलगाम जिलों में बड़ी संख्या में सेब के बाग हैं।

इन क्षेत्रों में फसल का मौसम समाप्त होने के बाद पेड़ों की छंटाई का काम शुरू हो चुका है।

स्थानीय स्तर पर छंटाई के बाद बची टहनियों को जलाने से शाम के समय धुआं फैलने की समस्या सामने आ रही है।

कई स्थानों पर बागों से उठने वाला धुआं मोटी परत के रूप में दिखाई देता है।

इससे आसपास के इलाकों में हवा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

हालांकि, इन जिलों के ताजा वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी AQI के सटीक आंकड़े उपलब्ध जानकारी में नहीं दिए गए हैं।

इसलिए प्रदूषण के स्तर में वास्तविक बदलाव का आकलन आधिकारिक निगरानी आंकड़ों से ही किया जा सकता है।

बच्चों और बुजुर्गों की सेहत पर खतरा

टहनियों और सूखी लकड़ियों को जलाने से निकलने वाला धुआं स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।

इस धुएं में सूक्ष्म कण और अन्य प्रदूषक मौजूद हो सकते हैं, जो सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं।

विशेष रूप से अस्थमा, एलर्जी और सांस संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों को इससे अधिक परेशानी हो सकती है।

बच्चों और बुजुर्गों को भी प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

धुएं के कारण आंखों में जलन, खांसी और सांस लेने में कठिनाई जैसी शिकायतें हो सकती हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ सामान्यतः ऐसे प्रदूषण के दौरान संवेदनशील लोगों को धुएं के सीधे संपर्क से बचने की सलाह देते हैं।

चारकोल बनाने के लिए भी जलाई जाती हैं डालियां

सेब के बागों में छंटाई के बाद निकलने वाली लकड़ियों का इस्तेमाल केवल अवशेषों को हटाने के लिए नहीं किया जाता।

स्थानीय स्तर पर इन टहनियों और डालियों का उपयोग सर्दियों के लिए चारकोल बनाने में भी होता है।

कश्मीर में सर्दियों के दौरान तापमान काफी कम हो जाता है। ऐसे में ईंधन की आवश्यकता बढ़ जाती है।

इसी कारण कुछ किसान छंटाई से निकली लकड़ियों को उपयोगी संसाधन के रूप में देखते हैं।

हालांकि, लकड़ी जलाने की प्रक्रिया के दौरान निकलने वाला धुआं आसपास के वातावरण को प्रभावित कर सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी गतिविधियों में कम प्रदूषण वाले तरीकों को बढ़ावा देना जरूरी है।

पर्यावरणविदों ने जताई चिंता

दक्षिण कश्मीर में बागों से उठने वाले धुएं को लेकर पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है।

उनका कहना है कि बड़ी मात्रा में कृषि अवशेषों को खुले में जलाने से स्थानीय वायु गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

यदि एक ही क्षेत्र में कई बागों में एक साथ टहनियां जलाई जाएं, तो धुएं की समस्या अधिक गंभीर हो सकती है।

विशेषज्ञों ने प्रशासन से ऐसी व्यवस्था विकसित करने की मांग की है, जिससे किसानों को अवशेषों के निपटान के लिए सुरक्षित और व्यावहारिक विकल्प मिल सकें।

उनका जोर इस बात पर है कि पर्यावरण संरक्षण के साथ किसानों की आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा जाए।

टहनियों के सुरक्षित निपटान की जरूरत

कृषि अवशेषों के निपटान के लिए खुले में जलाने के अलावा भी कई विकल्प अपनाए जा सकते हैं।

उपयुक्त टहनियों को छोटे टुकड़ों में काटकर जैविक मल्च के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे मिट्टी में नमी बनाए रखने और खरपतवार नियंत्रण में मदद मिल सकती है।

कुछ अवशेषों को उपयुक्त प्रसंस्करण के बाद खाद या अन्य उपयोगी उत्पादों में बदला जा सकता है।

हालांकि, रोगग्रस्त टहनियों का निपटान अलग सावधानी के साथ करना आवश्यक होता है, ताकि पौधों में बीमारियां न फैलें।

कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार अवशेष प्रबंधन की तकनीक अपनाने से किसानों को भी लाभ मिल सकता है।

किसानों के सामने भी व्यावहारिक चुनौती

सेब के बागों की छंटाई के बाद बड़ी मात्रा में लकड़ी और टहनियां निकलती हैं।

इन अवशेषों को एकत्र करना, अलग करना और सुरक्षित स्थान तक पहुंचाना किसानों के लिए अतिरिक्त श्रम तथा खर्च का कारण बन सकता है।

यही वजह है कि खुले में जलाना कई किसानों को आसान तरीका लगता है।

हालांकि, इस प्रक्रिया से पैदा होने वाले धुएं का असर आसपास रहने वाले लोगों पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को केवल जागरूक करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन्हें ऐसे विकल्प उपलब्ध कराने होंगे जो कम खर्चीले और आसानी से अपनाए जा सकें।

प्रशासन से प्रभावी कदम उठाने की मांग

कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने प्रशासन से टहनियों के सुरक्षित निपटान को बढ़ावा देने की अपील की है।

इसके लिए किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और अवशेष प्रबंधन के बेहतर तरीकों की जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है।

साथ ही प्रभावित क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता की नियमित निगरानी भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किस इलाके में प्रदूषण का स्तर कितना है और किन परिस्थितियों में धुएं की समस्या अधिक बढ़ती है।

हालांकि, प्रशासन की ओर से इस संबंध में किसी नई योजना या विशेष आदेश की जानकारी उपलब्ध विवरण में नहीं दी गई है।

सर्दियों से पहले बढ़ी प्रदूषण की चिंता

दक्षिण कश्मीर में सर्दियों की शुरुआत के साथ वायु प्रदूषण को लेकर चिंता बढ़ रही है।

सेब के बागों में छंटाई के बाद टहनियां जलाने की गतिविधियां इस समस्या को और बढ़ा सकती हैं।

शोपियां, पुलवामा और कुलगाम जैसे जिलों में शाम के समय धुएं का फैलना स्थानीय लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रहा है।

अब जरूरत इस बात की है कि किसानों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कृषि अवशेषों के सुरक्षित उपयोग और निपटान को बढ़ावा दिया जाए।

पर्यावरणविदों और कृषि विशेषज्ञों की मांग है कि प्रशासन समय रहते प्रभावी कदम उठाए, ताकि बागवानी गतिविधियां जारी रहने के साथ लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके।

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