जम्मू और कश्मीर

Kashmir में पैलेट गन पीड़ितों की दर्दभरी कहानी

Kiran
2 Aug 2026 12:27 PM IST
Kashmir में पैलेट गन पीड़ितों की दर्दभरी कहानी
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Kashmir कश्मीर में पैलेट गन पीड़ितों की दर्दभरी कहानी

साल 2016 में कश्मीर में हुई व्यापक अशांति ने हजारों लोगों के जीवन पर गहरा असर छोड़ा। सुरक्षा बलों द्वारा भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया, जिसके कारण बड़ी संख्या में लोग गंभीर रूप से घायल हुए। कई लोगों की आंखों की रोशनी चली गई, जबकि अनेक के शरीर में आज भी पैलेट के छर्रे मौजूद हैं। घटना को एक दशक होने के करीब है, लेकिन पीड़ितों के शारीरिक और मानसिक घाव अब भी पूरी तरह नहीं भर पाए हैं।

उस दौर में अस्पतालों में ऐसे मरीजों की लंबी कतारें देखने को मिली थीं जिनकी आंखों, चेहरे और शरीर में पैलेट धंसे हुए थे। डॉक्टरों ने कई जटिल सर्जरी कीं, लेकिन सभी मरीजों की दृष्टि बचाई नहीं जा सकी। कुछ लोगों की एक आंख की रोशनी चली गई, तो कुछ दोनों आंखों से देखने की क्षमता खो बैठे। कई पीड़ितों के शरीर में आज भी धातु के छोटे-छोटे छर्रे मौजूद हैं, जिन्हें निकालना चिकित्सकीय दृष्टि से जोखिम भरा माना जाता है। इन घावों का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहा। कई युवाओं की पढ़ाई बीच में छूट गई, जबकि कई लोग रोजगार करने में असमर्थ हो गए। परिवारों की आर्थिक स्थिति पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ा। जिन लोगों की दृष्टि प्रभावित हुई, उन्हें रोजमर्रा के काम करने में भी दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे उनके आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर पड़ा है।

कई पीड़ितों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि उन्हें बेहतर पुनर्वास, इलाज और आर्थिक सहायता की आवश्यकता है। कुछ सामाजिक संगठनों और अस्पतालों ने समय-समय पर मुफ्त इलाज, कृत्रिम दृष्टि सहायता और परामर्श सेवाएं उपलब्ध कराईं, लेकिन प्रभावित लोगों का मानना है कि दीर्घकालिक सहायता अभी भी पर्याप्त नहीं है। दूसरी ओर, सुरक्षा एजेंसियों का कहना रहा है कि पैलेट गन का उपयोग उस समय भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कम घातक विकल्प के रूप में किया गया था।

आज भी घाटी में ऐसे कई परिवार हैं जिनके सदस्य पैलेट गन से लगी चोटों के कारण सामान्य जीवन नहीं जी पा रहे हैं। कुछ लोग नियमित चिकित्सा जांच कराते हैं, जबकि कई अब भी दर्द, दृष्टि संबंधी समस्याओं और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल चिकित्सा उपचार ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक सहायता, पुनर्वास और रोजगार के अवसर भी उतने ही आवश्यक हैं। कश्मीर के इन पीड़ितों की कहानी यह याद दिलाती है कि किसी भी संघर्ष का सबसे बड़ा बोझ आम नागरिकों को उठाना पड़ता है। वर्षों बीत जाने के बाद भी उनके घाव केवल शरीर पर ही नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू पर दिखाई देते हैं। इसलिए प्रभावित लोगों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, पुनर्वास और सामाजिक सहयोग सुनिश्चित करना भविष्य की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता बनी हुई है।

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