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कश्मीर में मारखोर की वापसी के संकेत, काज़िनाग में आबादी 2005 से 71% बढ़ी

श्रीनगर: भारत में सिर्फ जम्मू-कश्मीर के चुनिंदा इलाकों में पाई जाने वाली दुर्लभ जंगली बकरी कश्मीरी मारखोर की आबादी में धीरे-धीरे सुधार के संकेत मिल रहे हैं। उत्तरी कश्मीर के काज़िनाग क्षेत्र में इस दुर्लभ प्रजाति की अनुमानित संख्या 2023 में 221 थी, जो इस साल बढ़कर करीब 227 हो गई है। संख्या में यह बढ़ोतरी भले ही मामूली दिखाई दे, लेकिन पिछले दो दशकों के आंकड़ों से तुलना करें तो तस्वीर काफी उत्साहजनक नजर आती है।
काज़िनाग में मारखोर की आबादी वर्ष 2005 में करीब 133 दर्ज की गई थी। अब यह संख्या बढ़कर 227 के आसपास पहुंच गई है। इस तरह करीब दो दशकों में यहां मारखोर की आबादी में लगभग 71 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से इसे महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है, क्योंकि मारखोर की निगरानी और सुरक्षा दोनों ही बेहद कठिन परिस्थितियों में की जाती है।
काज़िनाग नेशनल पार्क उत्तरी कश्मीर में नियंत्रण रेखा यानी LoC के करीब स्थित है। यह इलाका ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों, दुर्गम रास्तों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के लिए जाना जाता है। सुरक्षा प्रतिबंधों के कारण भी यहां नियमित वन्यजीव सर्वेक्षण और निगरानी आसान नहीं है। ऐसे माहौल में मारखोर की संख्या में लगातार सुधार संरक्षण प्रयासों के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
‘वाइल्डलाइफ वीक’ के दौरान वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया यानी WTI और जम्मू-कश्मीर वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन डिपार्टमेंट की संयुक्त इम्पैक्ट असेसमेंट रिपोर्ट जारी की गई। रिपोर्ट में मारखोर संरक्षण से जुड़े कई महत्वपूर्ण आंकड़े सामने रखे गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, चार अलग-अलग सीजन के दौरान मारखोर को करीब 600 बार सीधे देखा गया। इन प्रत्यक्ष अवलोकनों ने अधिकारियों और विशेषज्ञों को प्रजाति की मौजूदा आबादी, उसके वितरण और उसके व्यवहार को बेहतर ढंग से समझने में मदद की। कठिन इलाके में इतनी बड़ी संख्या में प्रत्यक्ष अवलोकन होना भी निगरानी व्यवस्था के मजबूत होने का संकेत माना जा रहा है।
मारखोर जंगली बकरियों की एक विशिष्ट प्रजाति है, जिसकी पहचान उसके लंबे और घुमावदार सींगों से होती है। यह प्रजाति ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों और चट्टानी इलाकों में रहने के लिए अनुकूलित है। भारत में इसकी मौजूदगी बेहद सीमित है, इसलिए इसकी आबादी में किसी भी तरह का बदलाव वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
काज़िनाग क्षेत्र में मारखोर संरक्षण लंबे समय से चुनौतीपूर्ण रहा है। यहां जानवरों को प्राकृतिक खतरों के साथ-साथ मानवीय दबाव, आवास क्षेत्र में बदलाव और कठिन सुरक्षा परिस्थितियों से भी जूझना पड़ता है। दुर्गम भूभाग के कारण गश्त और वैज्ञानिक निगरानी भी आसान नहीं रहती।
इसके बावजूद हालिया आंकड़े दिखाते हैं कि लंबे समय से जारी संरक्षण प्रयासों का सकारात्मक असर सामने आ रहा है। वर्ष 2005 में करीब 133 से बढ़कर मौजूदा अनुमान 227 तक पहुंचना यह बताता है कि प्रजाति के संरक्षण के लिए अपनाई गई रणनीतियों ने कुछ हद तक असर दिखाया है।
हालांकि विशेषज्ञों के सामने अभी भी कई चुनौतियां हैं। मारखोर की आबादी अभी इतनी बड़ी नहीं है कि उसके भविष्य को पूरी तरह सुरक्षित माना जा सके। किसी भी छोटे वन्यजीव समूह में बीमारी, आवास क्षति, शिकार या प्राकृतिक आपदा जैसी घटनाएं आबादी पर बड़ा असर डाल सकती हैं।
यही वजह है कि आबादी बढ़ने के बावजूद लगातार निगरानी जरूरी मानी जा रही है। नियमित सर्वेक्षण, आवास संरक्षण, मानव हस्तक्षेप को सीमित करना और स्थानीय स्तर पर वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कार्यक्रम इस प्रजाति के भविष्य के लिए अहम होंगे।
संयुक्त रिपोर्ट में चार मौसमों के दौरान किए गए अवलोकन यह भी बताते हैं कि केवल एक समय के सर्वेक्षण के बजाय अलग-अलग मौसम में निगरानी से प्रजाति की स्थिति का ज्यादा सटीक आकलन किया जा सकता है। मौसम के साथ मारखोर की गतिविधियों और रहने के स्थानों में बदलाव हो सकता है।
काज़िनाग की भौगोलिक स्थिति इसे वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से बेहद खास बनाती है। नियंत्रण रेखा के करीब होने की वजह से यहां सुरक्षा व्यवस्था का असर वन्यजीव गतिविधियों पर भी पड़ता है। कई हिस्सों तक पहुंच सीमित होने से सर्वेक्षण दलों के लिए पूरी आबादी का आकलन करना चुनौतीपूर्ण रहता है।
फिर भी 2023 के 221 से बढ़कर मौजूदा 227 के अनुमान तक पहुंचना संरक्षण एजेंसियों के लिए सकारात्मक संदेश है। यह बढ़ोतरी छोटी जरूर है, लेकिन दीर्घकालिक आंकड़ों के संदर्भ में इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
करीब 20 वर्षों में 71 प्रतिशत की वृद्धि यह संकेत देती है कि यदि संरक्षण प्रयास इसी तरह जारी रहे तो कश्मीरी मारखोर की आबादी भविष्य में और मजबूत हो सकती है। हालांकि इसके लिए केवल संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनके प्राकृतिक आवास और सुरक्षित आवाजाही के क्षेत्रों को भी संरक्षित करना जरूरी होगा।
कश्मीरी मारखोर की यह वापसी भारत के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों के लिए उम्मीद जगाने वाली खबर है। कठिन भौगोलिक और सुरक्षा परिस्थितियों के बावजूद काज़िनाग में इसकी संख्या में सुधार यह दिखाता है कि लगातार निगरानी और संरक्षण से दुर्लभ प्रजातियों को बचाने की दिशा में सकारात्मक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।





