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शेख अब्दुल्ला: कश्मीर की राजनीति का वह चेहरा, जिसकी विरासत आज भी बहस का विषय

श्रीनगर। कश्मीर की आधुनिक राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे रहे हैं, जिनका प्रभाव दशकों तक बना रहा। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला भी ऐसा ही एक नाम हैं, जिनकी राजनीतिक यात्रा संघर्ष, सत्ता, विवाद और बदलते रिश्तों से भरी रही।
करीब पांच दशक लंबे राजनीतिक जीवन में शेख अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति को नई दिशा दी। उन्होंने महाराजा हरि सिंह की सत्ता को चुनौती दी, मुस्लिम कॉन्फ्रेंस को बदलकर नेशनल कॉन्फ्रेंस का निर्माण किया, 1947 के राजनीतिक बदलावों में भारत के साथ खड़े हुए, राज्य की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे और बाद में केंद्र के साथ टकराव के कारण पद से हटाए भी गए।
उनकी राजनीति और विरासत को लेकर आज भी जम्मू-कश्मीर में अलग-अलग नजरिए मौजूद हैं।
महाराजा शासन के खिलाफ शुरू किया राजनीतिक संघर्ष
शेख मोहम्मद अब्दुल्ला का राजनीतिक उदय उस दौर में हुआ, जब जम्मू-कश्मीर में महाराजा हरि सिंह का शासन था।
उन्होंने आम लोगों, खासकर कश्मीर घाटी के किसानों और कमजोर वर्गों के मुद्दों को उठाते हुए राजनीतिक आंदोलन शुरू किया।
1930 के दशक में उन्होंने मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के जरिए राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। बाद में उन्होंने संगठन को व्यापक धर्मनिरपेक्ष स्वरूप देने की कोशिश की और इसे नेशनल कॉन्फ्रेंस में बदल दिया।
इस बदलाव का उद्देश्य कश्मीर की राजनीति को केवल धार्मिक पहचान से हटाकर सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों से जोड़ना था।
1947 के समय भारत के साथ खड़े हुए
1947 में जब भारत का विभाजन हुआ और जम्मू-कश्मीर के भविष्य को लेकर बड़ा राजनीतिक संकट पैदा हुआ, तब शेख अब्दुल्ला ने भारत के साथ जुड़ने का समर्थन किया।
उनकी नेशनल कॉन्फ्रेंस ने उस समय पाकिस्तान समर्थित कबायली हमले के खिलाफ भूमिका निभाई और भारत के साथ संबंधों के पक्ष में माहौल बनाया।
इसके बाद शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर की राजनीति में सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो गए।
सत्ता के शिखर तक पहुंचे
1948 में शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बने। उस समय राज्य को विशेष संवैधानिक व्यवस्था प्राप्त थी।
उन्होंने भूमि सुधारों और सामाजिक बदलावों से जुड़े कई कदम उठाए, जिन्हें उनके समर्थक आज भी उनकी बड़ी उपलब्धियों के रूप में देखते हैं।
हालांकि, केंद्र और राज्य के संबंधों को लेकर समय के साथ मतभेद बढ़ने लगे।
1953 में पद से हटाए गए और गिरफ्तार हुए
1953 में शेख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया और गिरफ्तार कर लिया गया।
उनकी गिरफ्तारी भारतीय राजनीति और कश्मीर के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल रही।
इसके बाद उन्होंने कई वर्ष जेल और नजरबंदी में बिताए।
उनके समर्थकों का मानना था कि यह कार्रवाई उनके राजनीतिक विचारों के कारण हुई, जबकि आलोचकों का कहना था कि उनके कुछ रुख राष्ट्रीय हितों को लेकर चिंता पैदा कर रहे थे।
जनमत-संग्रह की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मुद्दा
बाद के वर्षों में शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर के भविष्य को लेकर जनमत-संग्रह की मांग का समर्थन किया।
उन्होंने विदेश यात्राओं के दौरान भी कश्मीर मुद्दे को उठाया, जिससे उनकी राजनीति को लेकर विवाद और बढ़ा।
उनकी यह भूमिका भारत सरकार और उनके बीच दूरी का कारण बनी।
1975 में इंदिरा गांधी से समझौता
लंबे राजनीतिक संघर्ष के बाद 1975 में शेख अब्दुल्ला और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच समझौता हुआ।
इसके बाद शेख अब्दुल्ला फिर से जम्मू-कश्मीर की सत्ता में लौटे और मुख्यमंत्री बने।
इस समझौते को कश्मीर की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।
उनके समर्थकों ने इसे राजनीतिक स्थिरता की दिशा में कदम बताया, जबकि कुछ आलोचकों ने इसे उनके पुराने रुख में बदलाव के रूप में देखा।
1982 में निधन और जनसमर्थन
1982 में शेख अब्दुल्ला के निधन के बाद कश्मीर में बड़ी संख्या में लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे।
यह उनके लंबे राजनीतिक प्रभाव और जनता के बीच उनकी पकड़ को दर्शाता है।
हालांकि उनके निधन के बाद भी उनकी विरासत को लेकर बहस जारी रही।
दो अलग राजनीतिक स्मृतियों में बंटी विरासत
शेख अब्दुल्ला की राजनीति को लेकर कश्मीर में दो अलग-अलग दृष्टिकोण दिखाई देते हैं।
एक पक्ष उन्हें कश्मीर के अधिकारों, सामाजिक सुधारों और राजनीतिक पहचान के लिए संघर्ष करने वाले नेता के रूप में देखता है।
वहीं दूसरा पक्ष उन्हें भारत के साथ कश्मीर के संवैधानिक संबंधों को लेकर विवादों से जुड़े नेता के रूप में याद करता है।
बाद की अलगाववादी राजनीति में शेख अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस भारत के साथ कश्मीर के रिश्ते के प्रमुख राजनीतिक प्रतीकों में बदल गए।





