जम्मू और कश्मीर

कश्मीर में अखरोट की कटाई के दौरान सात मौतें, हाई डेंसिटी बागानों की मांग तेज

Kavita2
14 Sept 2026 4:24 PM IST
कश्मीर में अखरोट की कटाई के दौरान सात मौतें, हाई डेंसिटी बागानों की मांग तेज
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श्रीनगर। कश्मीर घाटी में अखरोट की कटाई का मौसम इस बार कई परिवारों के लिए मातम लेकर आया है। ऊंचे अखरोट के पेड़ों से गिरने की अलग-अलग घटनाओं में सात लोगों की मौत हो चुकी है। लगातार सामने आ रही इन दुर्घटनाओं ने पारंपरिक अखरोट बागानों में काम करने वाले मजदूरों और किसानों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसके साथ ही पुराने और ऊंचे पेड़ों की जगह आधुनिक हाई डेंसिटी अखरोट बागान विकसित करने की मांग भी तेज हो गई है।

कश्मीर में अखरोट की फसल तोड़ने का काम परंपरागत तरीके से किया जाता है। मजदूर या बागवान पेड़ों की ऊंची शाखाओं तक चढ़कर लकड़ी के लंबे डंडों से अखरोट गिराते हैं। पुराने पेड़ काफी ऊंचे और विशाल होते हैं। उनकी शाखाएं कई बार कमजोर, सूखी या फिसलन भरी होती हैं। थोड़ी सी चूक होने पर पेड़ से गिरने का खतरा रहता है। सुरक्षा उपकरणों के अभाव में ऐसी दुर्घटनाएं जानलेवा साबित होती हैं।

मौजूदा कटाई सत्र में सात लोगों की मौत ने इस पुराने खतरे को फिर चर्चा में ला दिया है। सितंबर के शुरुआती दिनों तक कम से कम चार मौतों की खबर सामने आई थी, जिसके बाद अन्य घटनाओं ने मृतकों की संख्या बढ़ा दी। कुलगाम में भी अखरोट तोड़ते समय पेड़ से गिरने से एक व्यक्ति की मौत होने की घटना सामने आई है।

सुरक्षा उपकरणों के बिना पेड़ों पर चढ़ते हैं मजदूर

अखरोट तोड़ने वाले अधिकतर मजदूर किसी पेशेवर सुरक्षा उपकरण के बिना पेड़ों पर चढ़ते हैं। उनके पास सुरक्षा बेल्ट, रस्सी, हेलमेट या ऊंचाई पर काम करने के लिए जरूरी उपकरण नहीं होते। कई बार पेड़ गीला होने, शाखा टूटने या पैर फिसलने से मजदूर सीधे जमीन पर गिर जाते हैं। अधिक ऊंचाई से गिरने के कारण सिर, रीढ़ और शरीर के दूसरे हिस्सों में गंभीर चोट लग सकती है।

दुर्घटना होने पर दूरदराज के बागानों से घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने में भी समय लगता है। कुछ बागान ऐसी जगहों पर स्थित हैं जहां एंबुलेंस या वाहन का तत्काल पहुंचना मुश्किल होता है। इस कारण समय पर इलाज नहीं मिलने का जोखिम भी बढ़ जाता है।

बागवानों का कहना है कि पारंपरिक अखरोट बागानों की मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। पुराने पेड़ न केवल बहुत ऊंचे हो चुके हैं, बल्कि उनकी उत्पादकता भी पहले की तुलना में कम बताई जा रही है। बड़े आकार के कारण एक पेड़ काफी भूमि घेरता है और उसकी देखरेख तथा कटाई पर अधिक श्रम खर्च होता है।

हाई डेंसिटी बागानों पर बढ़ी बहस

ड्राई फ्रूट एसोसिएशन ऑफ कश्मीर के अध्यक्ष हाजी बहादुर खान ने पुराने अखरोट बागानों को चरणबद्ध तरीके से हाई डेंसिटी प्लांटेशन में बदलने की जरूरत बताई है। उनके अनुसार, क्षेत्र में बड़ी संख्या में अखरोट के पेड़ पुराने हो चुके हैं और उनसे किसानों को नई किस्मों के बराबर उत्पादन नहीं मिल रहा है।

हाई डेंसिटी व्यवस्था में अपेक्षाकृत छोटे आकार वाली उन्नत किस्मों के पौधे कम दूरी पर लगाए जाते हैं। इससे सीमित भूमि पर अधिक पौधे लगाने की संभावना रहती है। पेड़ों की ऊंचाई कम होने से उनकी छंटाई, दवा का छिड़काव और फल की कटाई अपेक्षाकृत आसान हो सकती है। ऊंचे पेड़ों पर चढ़ने की जरूरत कम होने से मजदूरों के लिए दुर्घटना का खतरा भी घट सकता है।

पारंपरिक अखरोट के पेड़ों को फल देना शुरू करने में दस वर्ष से अधिक का समय लग सकता है। इसके विपरीत हाई डेंसिटी किस्मों में लगभग चार से पांच वर्ष में उत्पादन शुरू होने का दावा किया जा रहा है। हालांकि इसका वास्तविक परिणाम पौधे की किस्म, मिट्टी, जलवायु, सिंचाई और बागान प्रबंधन पर निर्भर करेगा।

पेड़ों को काटने पर कानूनी पाबंदी

बागानों के आधुनिकीकरण की राह में मौजूदा कानून को एक बड़ी चुनौती बताया जा रहा है। कश्मीर में अखरोट के पेड़ जम्मू-कश्मीर प्रिजर्वेशन ऑफ स्पेसिफाइड ट्रीज एक्ट 1969 के तहत संरक्षित हैं। इस कानून के कारण अखरोट के पेड़ को काटने के लिए सरकारी अनुमति आवश्यक होती है। स्वस्थ और फल देने वाले पेड़ों की कटाई पर भी पाबंदियां लागू हैं।

कानून का उद्देश्य मूल्यवान अखरोट के पेड़ों और क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का संरक्षण करना है। दूसरी ओर, बागवानों का कहना है कि पुराने, कम उत्पादक या असुरक्षित पेड़ों को हटाने की अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया जटिल होने से बागानों का नवीनीकरण प्रभावित होता है। वे ऐसी नीति की मांग कर रहे हैं जिसमें पेड़ों का संरक्षण भी हो और वास्तविक रूप से पुराने तथा कम उत्पादक पेड़ों को विशेषज्ञ जांच के बाद बदलने की अनुमति भी मिले।

घटती पैदावार और सस्ते आयात से चुनौती

सुरक्षा के अलावा अखरोट क्षेत्र आर्थिक चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। कारोबारियों के अनुसार, स्थानीय अखरोट की मांग पर जीएसटी और चिली, कैलिफोर्निया सहित दूसरे देशों से आने वाले अपेक्षाकृत सस्ते अखरोट का असर पड़ा है। पुराने पेड़ों से कम उत्पादन और कटाई की अधिक लागत के कारण स्थानीय बागवानों की आय प्रभावित होती है।

छोटे आकार की कृषि भूमि पर विशाल पारंपरिक पेड़ अधिक जगह घेरते हैं। दक्षिण कश्मीर के कुछ बागवानों का कहना है कि हाई डेंसिटी व्यवस्था अपनाने से कम भूमि में ज्यादा पेड़ लगाकर उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। हालांकि इसके लिए प्रमाणित पौधे, तकनीकी प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता और उचित बाजार व्यवस्था की जरूरत होगी।

तत्काल सुरक्षा उपाय भी जरूरी

हाई डेंसिटी बागान विकसित करने में कई वर्ष लगेंगे। इसलिए मौजूदा कटाई सत्र में मजदूरों की सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाना जरूरी है। बागवानों को सुरक्षा बेल्ट, मजबूत रस्सियां, हेलमेट और सुरक्षित सीढ़ियां उपलब्ध कराई जा सकती हैं। बारिश के बाद गीले पेड़ों पर चढ़ने से बचने और कमजोर शाखाओं की पहले पहचान करने के लिए जागरूकता अभियान भी चलाया जाना चाहिए।

सात मौतों ने स्पष्ट कर दिया है कि अखरोट क्षेत्र का आधुनिकीकरण केवल पैदावार का विषय नहीं है, बल्कि मजदूरों की जिंदगी और बागानों की आर्थिक व्यवहार्यता से भी जुड़ा हुआ है। सरकार के सामने अब पेड़ों के संरक्षण, किसानों की आय और सुरक्षित कटाई व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती है।

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