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डोडा मेडिकल कॉलेज में फिर प्रिंसिपल पद छोड़ने की तैयारी

डोडा। जम्मू संभाग के डोडा मेडिकल कॉलेज में प्रशासनिक संकट की स्थिति बनती नजर आ रही है। कॉलेज के प्रिंसिपल पद पर तैनात अधिकारी ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) के लिए आवेदन कर दिया है। इसके साथ ही यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है कि दूरदराज क्षेत्रों में स्थित मेडिकल कॉलेजों में वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति के बावजूद वे लंबे समय तक जिम्मेदारी संभालने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, जीएमसी डोडा में पिछले छह वर्षों में यह तीसरा मौका है जब कोई प्रिंसिपल अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले पद छोड़ने की इच्छा जता रहा है।
छह साल में तीसरे प्रिंसिपल ने मांगी वीआरएस
जीएमसी डोडा में पहला शैक्षणिक सत्र वर्ष 2020 में शुरू हुआ था। कॉलेज की शुरुआत के समय डॉ. तारिक आजाद को पहला प्रिंसिपल बनाया गया था।
डॉ. तारिक आजाद डोडा जिले के ही रहने वाले थे और उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया। उनके बाद डॉ. नूर अली ने कुछ समय के लिए प्रिंसिपल का पद संभाला, लेकिन उनका कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं रहा।
इसके बाद स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग ने जीएमसी जम्मू से प्रीवेंटिव सोशल मेडिसिन विभाग के एचओडी डॉ. दिनेश कुमार को जीएमसी डोडा का अतिरिक्त प्रभार सौंपा था।
हालांकि, अब डॉ. दिनेश कुमार ने भी समय से पहले सेवानिवृत्ति लेने के लिए आवेदन कर दिया है।
दूरदराज मेडिकल कॉलेजों में बनी चुनौती
डोडा मेडिकल कॉलेज का मामला अकेला नहीं है। जम्मू-कश्मीर के कई दूरदराज इलाकों में स्थापित मेडिकल कॉलेजों में भी इसी तरह की समस्या सामने आ रही है।
सरकार वरिष्ठता और अनुभव के आधार पर अधिकारियों को जिम्मेदारी तो सौंप रही है, लेकिन कई अधिकारी इन पदों पर लंबे समय तक बने रहने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।
दूरदराज क्षेत्रों में काम करने की कठिन परिस्थितियां, सीमित सुविधाएं और प्रशासनिक चुनौतियां इसके पीछे प्रमुख कारण मानी जा रही हैं।
मेडिकल कॉलेजों के संचालन पर असर
प्रिंसिपल पद किसी भी मेडिकल कॉलेज के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। कॉलेज के प्रशासन, शैक्षणिक गतिविधियों, अस्पताल व्यवस्था और विकास कार्यों की जिम्मेदारी प्रिंसिपल के पास होती है।
बार-बार नेतृत्व में बदलाव होने से कॉलेज की कार्यप्रणाली पर असर पड़ने की आशंका रहती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल कॉलेजों को स्थिर नेतृत्व की जरूरत होती है, ताकि संस्थान को बेहतर तरीके से विकसित किया जा सके।
सरकार के सामने नई चुनौती
स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के सामने अब डोडा मेडिकल कॉलेज में नए प्रिंसिपल की नियुक्ति की चुनौती खड़ी हो गई है।
विभाग को ऐसा अधिकारी तलाशना होगा जो न केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी संभाल सके, बल्कि दूरदराज क्षेत्र में लंबे समय तक सेवाएं देने के लिए भी तैयार हो।
सरकार लगातार जम्मू-कश्मीर में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में मेडिकल कॉलेजों में स्थायी नेतृत्व जरूरी माना जा रहा है।
दूरदराज क्षेत्रों में अधिकारियों की तैनाती पर सवाल
डोडा जैसे पहाड़ी और सीमावर्ती क्षेत्रों में अधिकारियों की तैनाती हमेशा से चुनौतीपूर्ण रही है।
हालांकि सरकार की ओर से इन क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए मेडिकल कॉलेज खोले गए हैं, लेकिन विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिकारियों की उपलब्धता एक बड़ी समस्या बनी हुई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मेडिकल कॉलेजों में स्थायी प्रिंसिपल और विशेषज्ञ डॉक्टरों की मौजूदगी से स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा सुधार आ सकता है।
कॉलेज के भविष्य पर नजर
जीएमसी डोडा में लगातार प्रिंसिपल बदलने की स्थिति ने कॉलेज के भविष्य को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं।
कॉलेज अभी विकास के शुरुआती चरण में है और इसे मजबूत प्रशासनिक नेतृत्व की जरूरत है।
विभाग अब इस बात पर विचार कर रहा है कि किस अधिकारी को जिम्मेदारी दी जाए, जो लंबे समय तक संस्थान का नेतृत्व कर सके।
स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत
जम्मू-कश्मीर के दूरदराज इलाकों में मेडिकल कॉलेज खोलना सरकार की बड़ी पहल रही है। लेकिन इन संस्थानों को सफल बनाने के लिए केवल भवन और सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं।
इसके लिए अनुभवी नेतृत्व, पर्याप्त स्टाफ और स्थायी प्रशासनिक व्यवस्था भी जरूरी है।
डोडा मेडिकल कॉलेज में प्रिंसिपल पद को लेकर पैदा हुई स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि दूरदराज क्षेत्रों में अधिकारियों को बनाए रखने के लिए सरकार को नई रणनीति बनाने की जरूरत है।
फिलहाल डोडा मेडिकल कॉलेज में नए प्रिंसिपल की नियुक्ति का इंतजार है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभाग इस चुनौती से कैसे निपटता है और कॉलेज को स्थायी नेतृत्व कब मिलता है।





