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लद्दाख में जैविक खेती की पहल, रासायनिक उर्वरकों पर पूरी रोक

लेह : देश में जैविक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख ने कृषि क्षेत्र में रासायनिक और सिंथेटिक उर्वरकों के उपयोग तथा बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। इस निर्णय के साथ ही लद्दाख को भारत का दूसरा पूर्ण जैविक प्रदेश बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल शुरू हो गई है। इससे पहले सिक्किम देश का पहला पूर्ण जैविक राज्य बन चुका है।
लद्दाख प्रशासन के इस फैसले को पर्यावरण संरक्षण, टिकाऊ कृषि और स्थानीय पारंपरिक खेती को बढ़ावा देने के लिहाज से ऐतिहासिक माना जा रहा है। प्रशासन का उद्देश्य क्षेत्र में प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करना और किसानों को रासायनिक खेती से दूर ले जाकर जैविक तरीकों की ओर बढ़ाना है।
लद्दाख की भौगोलिक परिस्थितियां देश के अन्य कृषि क्षेत्रों से काफी अलग हैं। यहां की ऊंचाई, ठंडा मौसम और सीमित कृषि क्षेत्र के बावजूद किसान लंबे समय से पारंपरिक तरीकों से खेती करते आए हैं। ऐसे में जैविक खेती को बढ़ावा देने से स्थानीय कृषि प्रणाली को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
प्रशासन के आदेश के अनुसार, अब लद्दाख में किसी भी प्रकार के रासायनिक-सिंथेटिक उर्वरकों की बिक्री, उपयोग और वितरण पर रोक रहेगी। इसका उद्देश्य मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखना, प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना और कृषि उत्पादों को अधिक सुरक्षित बनाना है।
विशेषज्ञों का कहना है कि रासायनिक उर्वरकों के लगातार इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है और पर्यावरण पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। जैविक खेती से मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है और किसानों को लंबे समय में अधिक टिकाऊ उत्पादन प्रणाली मिलती है।
लद्दाख प्रशासन इस बदलाव को केवल प्रतिबंध तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि किसानों को जैविक खेती के लिए प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और वैकल्पिक संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में भी काम करेगा। किसानों को जैविक खाद, प्राकृतिक खेती के तरीकों और बेहतर कृषि प्रबंधन की जानकारी दी जाएगी।
केंद्र सरकार भी पिछले कुछ वर्षों से जैविक खेती और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है। देश में जैविक उत्पादों की मांग बढ़ने के साथ ही किसानों के लिए नए बाजार अवसर भी तैयार हो रहे हैं।
लद्दाख के इस फैसले से स्थानीय कृषि उत्पादों को अलग पहचान मिलने की उम्मीद है। यहां उगाए जाने वाले फल, सब्जियां और अन्य कृषि उत्पाद जैविक प्रमाणन के बाद देश और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर संभावनाएं हासिल कर सकते हैं।
सिक्किम ने वर्ष 2016 में खुद को पूर्ण जैविक राज्य घोषित किया था। इसके बाद देश में जैविक खेती को लेकर उसकी पहचान एक मॉडल के रूप में बनी। अब लद्दाख भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है और जैविक कृषि के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने की तैयारी कर रहा है।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव को सफल बनाने के लिए किसानों को पर्याप्त सहायता और जागरूकता उपलब्ध कराना जरूरी होगा। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में खेती पहले से ही कई चुनौतियों से जुड़ी है, ऐसे में जैविक खेती के लिए आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण रहेगा।
किसानों के लिए जैविक खेती की ओर बदलाव शुरुआती दौर में चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन लंबे समय में इससे भूमि की उर्वरता, पर्यावरण संरक्षण और कृषि उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार होने की संभावना है।
लद्दाख प्रशासन का यह कदम हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरण अनुकूल विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और टिकाऊ जीवन शैली को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उठाया गया यह निर्णय आने वाले वर्षों में क्षेत्र की कृषि व्यवस्था को नई दिशा दे सकता है।
अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि प्रतिबंध लागू होने के बाद प्रशासन किसानों को किस तरह सहयोग उपलब्ध कराता है और लद्दाख कितनी तेजी से पूर्ण जैविक प्रदेश बनने के अपने लक्ष्य को हासिल करता है।





