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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र शासित प्रदेश का राज्य का दर्जा बहाल करने में हो रही देरी को लेकर निराशा जताई है। उन्होंने कहा कि राज्य का दर्जा बहाल किए जाने को लेकर लंबे समय से चल रही अनिश्चितता का असर जम्मू-कश्मीर की मुख्यधारा की राजनीति से जुड़े सभी लोगों पर पड़ रहा है। उमर ने कहा कि इस स्थिति का सबसे ज्यादा असर उन पर है, क्योंकि वह मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में सबसे ऊपरी पायदान पर हैं।
पत्रकार करण थापर को दिए एक इंटरव्यू में उमर अब्दुल्ला से जम्मू-कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने में हो रही देरी को लेकर सवाल पूछा गया। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर निराशा का माहौल है और यह निराशा केवल केंद्र की मौजूदा सरकार तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, इस स्थिति का असर उन सभी लोगों पर पड़ता है जो मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय हैं।
'निराशा का माहौल है'
उमर अब्दुल्ला ने बातचीत के दौरान कहा कि राज्य का दर्जा बहाल होने में देरी से राजनीतिक वर्ग में निराशा पैदा हो रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इसका असर जम्मू-कश्मीर के उन नेताओं पर भी पड़ रहा है जिन्होंने लोकतांत्रिक और मुख्यधारा की राजनीति में अपनी भूमिका बनाए रखी है।
उमर ने कहा कि वह खुद इस स्थिति से ज्यादा प्रभावित महसूस करते हैं, क्योंकि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में उनकी जिम्मेदारी सबसे बड़ी है। मुख्यमंत्री के तौर पर राज्य का दर्जा बहाल करने का मुद्दा उनके राजनीतिक एजेंडे का प्रमुख हिस्सा रहा है।
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है जब जम्मू-कश्मीर में राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग लगातार राजनीतिक चर्चा के केंद्र में बनी हुई है।
अगस्त 2019 के बाद बदली स्थिति
जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक और प्रशासनिक स्थिति में अगस्त 2019 में बड़ा बदलाव हुआ था। केंद्र सरकार ने उस समय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की थी। इसके साथ ही तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में विभाजित कर दिया गया था।
इसके बाद जम्मू-कश्मीर में विधानसभा और राज्य के दर्जे को लेकर राजनीतिक बहस लगातार जारी रही। राज्य की कई राजनीतिक पार्टियां केंद्र से पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग करती रही हैं।
राजनीतिक दलों का तर्क है कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को मजबूत करने और स्थानीय लोगों को अधिक राजनीतिक अधिकार देने के लिए जम्मू-कश्मीर को फिर से राज्य का दर्जा मिलना जरूरी है।
राजनीतिक दल लगातार उठा रहे मांग
अगस्त 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर की मुख्यधारा की कई राजनीतिक पार्टियों ने राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को अपने प्रमुख मुद्दों में शामिल किया है। चुनावों के दौरान भी यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया।
उमर अब्दुल्ला और उनकी पार्टी ने भी राज्य का दर्जा बहाल करने को लेकर लगातार केंद्र पर दबाव बनाने की बात कही है। जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव के बाद बनी सरकार के लिए यह मुद्दा और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
उमर के बयान से संकेत मिलता है कि राज्य का दर्जा बहाल करने को लेकर राजनीतिक नेतृत्व के बीच इंतजार और असमंजस की स्थिति बनी हुई है। सरकार की ओर से इस दिशा में स्पष्ट समयसीमा सामने नहीं आने को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा होती रही है।
मुख्यमंत्री के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती
उमर अब्दुल्ला के सामने राज्य का दर्जा बहाल करने का मुद्दा एक बड़ी राजनीतिक चुनौती के रूप में मौजूद है। एक ओर उन्हें जम्मू-कश्मीर में शासन और विकास से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना है, वहीं दूसरी ओर राज्य के राजनीतिक अधिकारों को लेकर जनता की अपेक्षाओं को भी संबोधित करना है।
राज्य का दर्जा बहाल होने से जम्मू-कश्मीर की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव आएंगे। मौजूदा केंद्र शासित प्रदेश व्यवस्था में उपराज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण है, जबकि पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने पर निर्वाचित सरकार की भूमिका और अधिकारों का दायरा अलग होगा।
इसी वजह से राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग जम्मू-कश्मीर की राजनीति में केवल संवैधानिक या प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह राजनीतिक अधिकारों और स्थानीय प्रतिनिधित्व से भी जुड़ गई है।
उम्मीद और इंतजार के बीच राजनीतिक माहौल
जम्मू-कश्मीर में राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को लेकर लंबे समय से उम्मीद और इंतजार का माहौल है। केंद्र सरकार की ओर से इस मुद्दे पर अलग-अलग मौकों पर आश्वासन और संकेत दिए गए हैं, लेकिन अभी तक राज्य का दर्जा बहाल किए जाने की स्पष्ट तारीख सामने नहीं आई है।
ऐसे में उमर अब्दुल्ला का निराशा वाला बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मुख्यमंत्री ने साफ संकेत दिया है कि लगातार बनी अनिश्चितता का असर मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय नेताओं और सरकार पर पड़ रहा है।
आगे केंद्र के रुख पर नजर
अब जम्मू-कश्मीर की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि केंद्र सरकार राज्य का दर्जा बहाल करने को लेकर क्या कदम उठाती है और इसकी प्रक्रिया कब शुरू होती है। उमर अब्दुल्ला सरकार के लिए यह मुद्दा आने वाले समय में भी प्राथमिकता में रहने की संभावना है।
अगस्त 2019 के बाद बदली संवैधानिक व्यवस्था के करीब सात साल गुजरने के बावजूद राज्य के दर्जे को लेकर राजनीतिक बहस खत्म नहीं हुई है। जम्मू-कश्मीर की मुख्यधारा की पार्टियां इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर देख रही हैं, जबकि केंद्र के अगले कदम का इंतजार जारी है।
उमर अब्दुल्ला का ताजा बयान बताता है कि राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग अब भी जम्मू-कश्मीर की राजनीति के केंद्र में है। उनके मुताबिक, इस मुद्दे पर बनी अनिश्चितता का असर केवल सरकार या किसी एक राजनीतिक दल पर नहीं, बल्कि पूरी मुख्यधारा की राजनीतिक व्यवस्था पर पड़ रहा है।





