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जम्मू और कश्मीर
NIT राउरकेला ने विकसित की बायो-इंक, 3D बायोप्रिंटिंग में नई क्रांति
Payal
20 April 2026 5:50 PM IST

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Rourkela.राउरकेला: राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) राउरकेला के वैज्ञानिकों ने 3D बायोप्रिंटिंग के लिए नई बायो-इंक विकसित की है। यह उपलब्धि बायोमेडिकल इंजीनियरिंग और ऊतक अभियांत्रिकी में नई संभावनाओं को खोलती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस बायो-इंक का उपयोग ऊतक निर्माण, अंग प्रत्यारोपण और दवा वितरण प्रणाली में किया जा सकता है।
NIT राउरकेला के बायोमेडिकल विभाग के शोधकर्ताओं ने बताया कि इस बायो-इंक को विशेष रूप से सेल फ्रेंडली सामग्री और बायोडिग्रेडेबल पॉलीमर का उपयोग करके तैयार किया गया है। इससे प्रिंट की गई संरचनाएं जैविक रूप से अनुकूल और टिकाऊ होती हैं। शोध टीम ने इसे तीन-आयामी ऊतक संरचनाओं के निर्माण में परीक्षण किया है, जिसमें सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं।
प्रोफेसर अजय कुमार सिंह, जिन्होंने इस परियोजना का नेतृत्व किया, ने बताया कि इस बायो-इंक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह मानव ऊतक के प्राकृतिक गुणों की नकल कर सकती है। उनका कहना था, “इस शोध से हम मेडिकल इंडस्ट्री और बायोफैब्रिकेशन में नई दिशा स्थापित कर सकते हैं। इससे अंगों और ऊतकों की प्राकृतिक संरचना और कार्यक्षमता के अनुरूप प्रिंटिंग संभव हो पाएगी।”
विशेषज्ञों ने कहा कि यह बायो-इंक दवा परीक्षण और जैविक मॉडल बनाने में भी सहायक होगी। इससे नए उपचार और दवा विकास की प्रक्रिया तेज़ होगी और लागत में भी कमी आएगी। इसके अलावा, यह बायो-इंक 3D प्रिंटिंग तकनीक के माध्यम से जटिल ऊतक संरचनाओं को बनाने में मदद कर सकती है।
NIT राउरकेला के वैज्ञानिकों ने कहा कि उन्होंने इस बायो-इंक के निर्माण में स्थानीय और कम लागत वाले संसाधनों का उपयोग किया है, जिससे इसे व्यावसायिक और शैक्षणिक दोनों क्षेत्रों में इस्तेमाल करना आसान होगा। इससे न केवल शिक्षा और अनुसंधान क्षेत्र में बल्कि स्वास्थ्य सेवा और बायोटेक उद्योग में भी संभावनाएं बढ़ेंगी।
इस शोध परियोजना का उद्देश्य है ऊतक इंजीनियरिंग में अंतर्राष्ट्रीय मानक स्थापित करना और 3D बायोप्रिंटिंग तकनीक को जैविक और चिकित्सीय अनुप्रयोगों में अनुकूल बनाना। शोध टीम ने बताया कि अगले चरण में वे इस बायो-इंक का मानव ऊतक परीक्षण और बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करने की योजना बना रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि NIT राउरकेला की यह उपलब्धि भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इससे देश में बायोमेडिकल अनुसंधान और औद्योगिक विकास को भी गति मिलेगी।
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