जम्मू और कश्मीर

मीरवाइज उमर फारूक ने जम्मू-कश्मीर में संगठनों पर लगे प्रतिबंधों की समीक्षा की मांग की

Kavita2
8 Sept 2026 2:45 PM IST
मीरवाइज उमर फारूक ने जम्मू-कश्मीर में संगठनों पर लगे प्रतिबंधों की समीक्षा की मांग की
x

श्रीनगर। कश्मीर के मुख्य धर्मगुरु मीरवाइज उमर फारूक ने मंगलवार को केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर में सामाजिक और राजनीतिक संगठनों पर लगाए गए प्रतिबंधों की समीक्षा करने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रतिबंधों पर दोबारा विचार करना क्षेत्र में शांति और स्थिरता के हित में हो सकता है।

मीरवाइज ने यह बयान प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी के पूर्व प्रमुख गुलाम मोहम्मद भट के हालिया बयान के बाद दिया। भट ने अपने संगठन को जस्टिस एंड डेवलपमेंट फ्रंट से अलग बताया था। यह राजनीतिक दल जमात से अलग हुए एक गुट द्वारा 2024 के विधानसभा चुनावों से पहले बनाया गया था।

प्रतिबंधों पर पुनर्विचार की मांग

मीरवाइज उमर फारूक ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों पर लगे प्रतिबंधों को लेकर सरकार को नए सिरे से विचार करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने और समाज में संवाद बढ़ाने के लिए ऐसे कदम मददगार हो सकते हैं।

उनका कहना था कि किसी भी क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता के लिए लोगों की भागीदारी और संवाद बेहद जरूरी होता है।

जमात-ए-इस्लामी से जुड़े बयान पर प्रतिक्रिया

मीरवाइज का बयान जमात-ए-इस्लामी के पूर्व प्रमुख गुलाम मोहम्मद भट के उस बयान के बाद आया, जिसमें उन्होंने जमात और जस्टिस एंड डेवलपमेंट फ्रंट के बीच किसी भी तरह के संबंध से इनकार किया था।

जस्टिस एंड डेवलपमेंट फ्रंट का गठन जमात-ए-इस्लामी से अलग हुए एक गुट ने किया था और इसने 2024 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों में राजनीतिक भागीदारी की थी।

गुलाम मोहम्मद भट ने संगठन की अलग पहचान को लेकर अपना पक्ष रखा था।

राजनीतिक भागीदारी पर जोर

मीरवाइज ने अपने बयान में संकेत दिया कि राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों के लिए जगह उपलब्ध होना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अलग-अलग विचार रखने वाले लोगों और संगठनों के लिए संवाद के रास्ते खुले रहने चाहिए।

उनके अनुसार, किसी भी समाज में स्थायी शांति के लिए सभी वर्गों को साथ लेकर चलना जरूरी है।

जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंधों का मुद्दा

जम्मू-कश्मीर में कई संगठनों पर समय-समय पर सुरक्षा कारणों से प्रतिबंध लगाए गए हैं।

सरकार का तर्क रहा है कि ऐसे कदम सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को रोकने के लिए उठाए जाते हैं।

वहीं, कुछ राजनीतिक और सामाजिक नेताओं का कहना रहा है कि लंबे समय तक प्रतिबंध जारी रहने से संवाद और राजनीतिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

शांति और स्थिरता पर दिया जोर

मीरवाइज ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में शांति और स्थिरता बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।

उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि वह ऐसे मामलों में व्यापक दृष्टिकोण अपनाए और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए फैसले ले।

उनका कहना था कि सकारात्मक माहौल बनाने के लिए संवाद और विश्वास बहाली के प्रयास जरूरी हैं।

राजनीतिक गतिविधियों में बदलाव

जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक गतिविधियों में कई बदलाव देखने को मिले हैं।

2024 के विधानसभा चुनावों के बाद क्षेत्र में नई राजनीतिक परिस्थितियां बनी हैं। ऐसे समय में विभिन्न संगठनों की भूमिका और उनकी गतिविधियों को लेकर चर्चा तेज हुई है।

सुरक्षा और लोकतंत्र के बीच संतुलन की बात

विशेषज्ञों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में सुरक्षा और लोकतांत्रिक भागीदारी के बीच संतुलन बनाए रखना एक चुनौतीपूर्ण विषय है।

जहां सरकार सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देती है, वहीं राजनीतिक समूह अधिक संवाद और भागीदारी की मांग करते रहे हैं

Next Story