जम्मू और कश्मीर

बारिश और भूस्खलन से बार-बार प्रभावित हो रहा जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे

Kavita2
4 Aug 2026 11:09 AM IST
बारिश और भूस्खलन से बार-बार प्रभावित हो रहा जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे (NH-44) एक बार फिर मानसून के दौरान आने वाली चुनौतियों को लेकर चर्चा में है। घाटी की जीवनरेखा माने जाने वाले इस हाईवे पर भारी बारिश के कारण भूस्खलन, पत्थर गिरने और चट्टानों के खिसकने की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। इन घटनाओं के कारण कई बार यातायात बाधित हो जाता है और सैकड़ों वाहन घंटों तक सड़क पर फंसे रहते हैं।

करीब 270 किलोमीटर लंबा जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे जम्मू क्षेत्र को कश्मीर घाटी से जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है। इसे हर मौसम में चलने वाली सड़क के रूप में विकसित किया गया है, ताकि सालभर घाटी का संपर्क देश के अन्य हिस्सों से बना रहे। लेकिन पहाड़ी इलाकों की भौगोलिक स्थिति और मानसून के दौरान होने वाली तेज बारिश इस हाईवे के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।

रामबन, बनिहाल और आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में बारिश के बाद भूस्खलन की घटनाएं अधिक देखने को मिलती हैं। पहाड़ों से मलबा और बड़े-बड़े पत्थर सड़क पर गिरने से यातायात रोकना पड़ता है। कई बार सड़क साफ करने में घंटों लग जाते हैं, जिससे यात्रियों, स्थानीय लोगों और मालवाहक वाहनों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।

पिछले कुछ वर्षों में इस हाईवे पर प्राकृतिक घटनाओं के कारण कई गंभीर हादसे भी हुए हैं। पत्थर गिरने और भूस्खलन की वजह से लोगों की जान जाने की घटनाएं सामने आई हैं। इससे हाईवे की सुरक्षा और स्थिरता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

प्रशासन और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की ओर से समय-समय पर सड़क को सुरक्षित बनाने के लिए कदम उठाए जाते रहे हैं। संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा दीवारें, सुरंगों का निर्माण, ढलानों को मजबूत करने और मलबा हटाने के लिए आधुनिक मशीनों की तैनाती जैसे उपाय किए गए हैं। इसके बावजूद पहाड़ी क्षेत्र की प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण चुनौतियां बनी हुई हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में निर्माण कार्यों के दौरान पर्यावरणीय संतुलन और भूगर्भीय स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है। पहाड़ों की कटाई, जल निकासी व्यवस्था में बदलाव और लगातार बढ़ती बारिश की घटनाएं भूस्खलन के खतरे को बढ़ा सकती हैं। ऐसे में सड़क सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक योजनाओं की जरूरत है।

जम्मू-श्रीनगर हाईवे केवल यात्रियों के आवागमन का साधन नहीं है, बल्कि जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। इसी मार्ग से बड़ी मात्रा में खाद्य सामग्री, दवाइयां, निर्माण सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति घाटी तक पहुंचती है। हाईवे बंद होने से आम लोगों के साथ-साथ व्यापार और आपूर्ति व्यवस्था पर भी असर पड़ता है।

मानसून के दौरान प्रशासन की ओर से यात्रियों को मौसम और सड़क की स्थिति की जानकारी लेने के बाद यात्रा करने की सलाह दी जाती है। संवेदनशील इलाकों में यातायात को नियंत्रित करने के लिए कई बार वाहनों की आवाजाही रोकनी पड़ती है, ताकि किसी बड़ी दुर्घटना को टाला जा सके।

हाल के वर्षों में जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम हुआ है। नए पुलों, सुरंगों और सड़क चौड़ीकरण परियोजनाओं के जरिए यात्रा को आसान और सुरक्षित बनाने की कोशिश की जा रही है। बनिहाल-काजीगुंड क्षेत्र में सुरंगों के निर्माण से मौसम की मार को कम करने में मदद मिली है, लेकिन खुले पहाड़ी हिस्सों में भूस्खलन का खतरा अब भी बना हुआ है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के पैटर्न में बदलाव आ रहा है। कम समय में अधिक बारिश होने की घटनाएं बढ़ने से पहाड़ी क्षेत्रों में मिट्टी कमजोर हो रही है और भूस्खलन की संभावना बढ़ रही है। इसलिए भविष्य में हाईवे की सुरक्षा के लिए जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखकर योजनाएं बनानी होंगी।

जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे जम्मू-कश्मीर की जीवनरेखा है और इसके निर्बाध संचालन का सीधा संबंध घाटी के सामाजिक और आर्थिक विकास से जुड़ा है। हालांकि, मानसून और पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इसके सामने आने वाली चुनौतियां अभी भी कायम हैं। सुरक्षित और सुचारु यातायात के लिए तकनीकी उपायों के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना भी जरूरी होगा।

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