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Jammu में वन भूमि अतिक्रमण का गंभीर मामला, अवैध कॉलोनियों और माफिया नेटवर्क पर सवाल

Jammu जम्मू: जम्मू में वन भूमि पर बढ़ते अतिक्रमण ने अब गंभीर और संगठित रूप ले लिया है। शहर और आसपास के क्षेत्रों में तेजी से जंगलों की कटाई कर अवैध कॉलोनियों का विस्तार होने से प्रशासनिक दावों पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। स्थिति यह है कि कई इलाकों में वन भूमि पर आलीशान बंगले, पक्की सड़कें और पूरी तरह विकसित रिहायशी कॉलोनियां तक खड़ी हो चुकी हैं।
सूत्रों के अनुसार, वन विभाग के भीतर से मिली जानकारी में यह बात सामने आई है कि इन अवैध कब्जों के पीछे एक संगठित भूमि माफिया सक्रिय है। यह माफिया प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत से वन भूमि को समतल कर उसे अवैध तरीके से बेचने का काम कर रहा है। इस पूरे नेटवर्क के कारण अतिक्रमण का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
अधिकारियों का कहना है कि इन अवैध कॉलोनियों में कई रसूखदार व्यक्तियों, नेताओं और नौकरशाहों के रहने की भी जानकारी है, जिससे कार्रवाई करना और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। विभागीय स्तर पर दबाव और प्रभाव के कारण कई मामलों में सख्त कदम उठाने में बाधाएं सामने आ रही हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में वन भूमि पर तेजी से निर्माण कार्य बढ़ा है, लेकिन समय रहते रोकथाम के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए। इसके चलते जंगल क्षेत्र घटता गया और शहरी विस्तार अनियंत्रित रूप से फैलता चला गया।
वन विभाग के अधिकारियों ने माना है कि अतिक्रमण अब व्यक्तिगत स्तर से आगे बढ़कर एक संगठित रैकेट का रूप ले चुका है। इसमें भूमि की खरीद-फरोख्त, नकली दस्तावेजों और प्रभावशाली नेटवर्क का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस वजह से जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया जटिल होती जा रही है।
प्रशासनिक स्तर पर हालांकि अतिक्रमण हटाने के लिए समय-समय पर अभियान चलाए जाते रहे हैं, लेकिन इन प्रयासों के बावजूद समस्या पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सकी है। कई जगहों पर कार्रवाई के बाद भी दोबारा कब्जे की शिकायतें सामने आ रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस तरह का अतिक्रमण जारी रहा तो इससे न केवल पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ेगा, बल्कि जल स्रोतों और पारिस्थितिकी संतुलन पर भी खतरा बढ़ेगा। जंगलों के कम होने से वन्यजीवों के आवास भी प्रभावित हो रहे हैं।
फिलहाल प्रशासन इस मामले की गहन जांच की बात कर रहा है और अवैध कॉलोनियों की पहचान कर कार्रवाई की योजना बनाई जा रही है। हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर सख्त इच्छाशक्ति नहीं दिखेगी, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान मुश्किल है।





