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जम्मू-कश्मीर HC ने 12 साल बाद हत्या के आरोपी को दी जमानत

Jammu जम्मू: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने हत्या के एक आरोपी केवल शर्मा को लगभग 12 साल की निरंतर न्यायिक हिरासत के बाद जमानत दे दी है। हाईकोर्ट ने इस निर्णय में लंबे समय तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रखा जाना उसके मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया और स्पीडी ट्रायल के अधिकार को मजबूती दी।
मामले के अनुसार देवनगर नार्दी, अखनूर निवासी केवल शर्मा पुत्र मोहन लाल शर्मा को वर्ष 2014 में हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद केवल शर्मा छह जून 2014 से लगातार न्यायिक हिरासत में था। जमानत याचिका में बताया गया कि पुलिस केस पूरी तरह से हालात से उत्पन्न सबूतों पर आधारित है और इसमें कोई प्रत्यक्ष साक्षी (आई-विटनेस) मौजूद नहीं है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केवल शर्मा के लंबे समय तक जेल में रहना और केस की सुनवाई में विलंब होना न्यायिक प्रणाली की तेज़ी के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने यह भी माना कि आरोपी को पर्याप्त कानूनी आधार और जमानत के लिए पात्र माना जा सकता है, क्योंकि मामले में कोई ठोस प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है।
आदेश में अदालत ने कहा, "विचाराधीन कैदियों के लिए स्पीडी ट्रायल का अधिकार केवल कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है। लंबित मामलों में दोषसिद्धि होने से पहले आरोपी को अनिश्चितकालीन जेल में रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।"
अदालत ने मामले में पुलिस को निर्देश दिया कि जमानत मिलने के बाद भी वे आरोपित के खिलाफ केस की जांच जारी रखें, लेकिन उसे जेल में रखना अनावश्यक है। अदालत ने यह सुनिश्चित किया कि आरोपी निर्धारित शर्तों के तहत जमानत पर रिहा होगा और किसी भी तरह के संदेह या फरार होने की आशंका नहीं हो।
इस निर्णय के बाद केवल शर्मा को जेल से रिहा कर दिया गया। यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने और विचाराधीन कैदियों के अधिकारों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
अधिकारियों और न्यायिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला स्पीडी ट्रायल के अधिकार को मजबूत करने के साथ-साथ लंबित मामलों में आरोपी की सुरक्षा और मौलिक अधिकारों की रक्षा को प्राथमिकता देने वाला कदम है। लंबे समय से न्यायिक हिरासत में रह रहे कई अन्य आरोपियों के लिए भी इस तरह के फैसले कानूनी आधार प्रदान कर सकते हैं।
केवल शर्मा के वकील ने कहा कि इस फैसले से न्यायिक प्रणाली में लंबे समय तक जेल में रह रहे विचाराधीन कैदियों के अधिकारों की रक्षा होगी और भविष्य में स्पीडी ट्रायल के अधिकार को लागू करने में मदद मिलेगी।





