जम्मू और कश्मीर

दीपावली पर घर होंगे रोशन, जम्मू के कुम्हारों की कमाई पर संकट

nidhi
24 Oct 2026 8:14 AM IST
दीपावली पर घर होंगे रोशन, जम्मू के कुम्हारों की कमाई पर संकट
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कुम्हारों ने बयां किया दर्द
जम्मू: दीपावली पर घरों और बाजारों की रोशनी के बीच मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगरों की आजीविका का सवाल भी महत्वपूर्ण है। एक दीया खरीदार के लिए पूजा और सजावट का सामान होता है, लेकिन उसे बनाने वाले परिवार के लिए वही कमाई का जरिया है। ऐसे में त्योहार की रौनक का वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब तैयार माल बिके और उसकी कीमत में सामग्री के साथ मेहनत का उचित हिस्सा भी शामिल हो। जम्मू-कश्मीर की कुम्हारी पर सामने आई रिपोर्टें इस पारंपरिक काम के सामने बाजार और स्थिर आय की चुनौती दिखाती हैं।
दीया बनाने की प्रक्रिया केवल चाक पर मिट्टी को आकार देने तक सीमित नहीं होती। मिट्टी तैयार करने, आकार देने, सुखाने, भट्ठी में पकाने और फिर सुरक्षित रखने के बाद उत्पाद बिक्री के योग्य बनता है। इन चरणों में समय, श्रम और संसाधन लगते हैं। इसलिए दुकान पर दिखाई देने वाली बिक्री की रकम को सीधे मुनाफा नहीं माना जा सकता। कारीगर की वास्तविक कमाई जानने के लिए उत्पादन, परिवहन और दूसरे खर्च घटाना जरूरी है। जम्मू के लिए इस वर्ष ऐसी विस्तृत लागत और आय का सत्यापित हिसाब उपलब्ध नहीं है।
कुम्हारी की व्यापक स्थिति समझने में मार्च 2026 में प्रकाशित कश्मीर की एक रिपोर्ट महत्वपूर्ण संदर्भ देती है। उसमें पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों की मांग पर धातु, प्लास्टिक और कारखानों में बने दूसरे उत्पादों के प्रभाव का उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ कारीगर स्थिर आय की तलाश में अन्य कामों की ओर गए हैं। यह विवरण मुख्यतः कश्मीर के कारीगरों से संबंधित है; इसे जम्मू के हर परिवार की समान स्थिति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। हालांकि, यह पारंपरिक शिल्प के सामने बाजार बदलने की चुनौती को सामने रखता है।
मौसमी बिक्री पर निर्भर व्यवसाय में तैयारी और कमाई के बीच अंतर रहता है। उत्पाद पहले बनाने पड़ते हैं, जबकि बिक्री बाद में होती है। मांग का अनुमान गलत होने पर तैयार माल बच सकता है। दूसरी ओर, अचानक बड़ा ऑर्डर मिलने पर कम समय में उत्पादन बढ़ाना कठिन हो सकता है। यही वजह है कि कारीगरों के लिए केवल त्योहार के अंतिम दिनों की खरीदारी के बजाय पहले से मिले ऑर्डर उपयोगी हो सकते हैं। इससे उत्पादन की मात्रा, सामग्री और काम के समय की योजना बनाने में मदद मिल सकती है।
पारंपरिक उत्पादों के लिए नए बाजार तलाशना भी एक रास्ता है। दीयों के साथ सजावटी वस्तुएं, गमले और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार करने से कारोबार के अवसर बढ़ सकते हैं। लेकिन नया डिजाइन बनाना अपने आप बिक्री सुनिश्चित नहीं करता। खरीदार तक पहुंच, गुणवत्ता, उचित कीमत और सुरक्षित पैकिंग भी जरूरी हैं। डिजिटल माध्यम कुछ कारीगरों को मदद दे सकते हैं, मगर हर परिवार के पास ऑनलाइन बिक्री संभालने के साधन या अनुभव हों, यह मान लेना ठीक नहीं होगा। स्थानीय दुकानों और सामूहिक बिक्री केंद्रों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रह सकती है।
जम्मू में कौशल बढ़ाने की कोशिशें हुई हैं। फरवरी 2026 में भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत न्यास की जम्मू इकाई और ब्लू रिवर सेरामिक्स के सहयोग से पारंपरिक कुम्हारों के लिए दस दिन की कार्यशाला आयोजित की गई थी। इसमें टेराकोटा, सतह की सजावट, ग्लेजिंग और भट्ठी में पकाने की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया। आयोजन का उद्देश्य पारंपरिक हुनर के साथ समकालीन डिजाइन की समझ विकसित करना था। यह पहल बताती है कि शिल्प को बचाने के लिए तकनीक और डिजाइन पर भी काम किया जा रहा है।
प्रशिक्षण के साथ बिक्री की जगह उपलब्ध होना भी जरूरी है। त्योहारों में छोटे विक्रेताओं, फेरीवालों और कुम्हारों की आजीविका को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों की जानकारी पांच अक्टूबर की एक रिपोर्ट में सामने आई। इसके अनुसार, आयोग ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से कहा कि स्थानीय विक्रेताओं को अनावश्यक रूप से हटाकर उनकी रोजी-रोटी प्रभावित न की जाए। जहां अग्नि सुरक्षा या सार्वजनिक सुरक्षा के कारण स्थान खाली कराना आवश्यक हो, वहां उपयुक्त वैकल्पिक बिक्री स्थल उपलब्ध कराया जाए।
इसी रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग ने सामान की मनमानी जब्ती और अनावश्यक कार्रवाई से बचने तथा उत्पीड़न की शिकायतों पर कानून के अनुसार कदम उठाने को कहा। स्थानीय उत्पादों और पारंपरिक व्यवसायों को प्रोत्साहन देने का भी उल्लेख किया गया। ये निर्देश व्यापक स्तर के हैं; जम्मू में किसी विशिष्ट कुम्हार के साथ ऐसी घटना होने की पुष्टि इनसे नहीं होती। फिर भी, सुरक्षित और व्यवस्थित बाजार की उपलब्धता छोटे कारीगरों की आजीविका के लिए क्यों जरूरी है, इसका महत्व स्पष्ट होता है।
खरीदारों की भूमिका भी व्यावहारिक हो सकती है। स्थानीय कारीगर से सीधे खरीद, समय रहते ऑर्डर और मेहनत के अनुरूप भुगतान से उसे बेहतर बाजार मिल सकता है। संस्थान और सामुदायिक समूह अपनी जरूरत के दीये पहले बुक कर सकते हैं। साथ ही, उत्पाद की गुणवत्ता और कीमत पर स्पष्ट बातचीत जरूरी है। जम्मू के कुम्हारों की इस दीपावली की वास्तविक कमाई का आकलन बिक्री के बाद होगा। फिलहाल आवश्यक है कि उनकी परेशानी को अपुष्ट आंकड़ों के बजाय विश्वसनीय जानकारी से समझा जाए और मदद को नियमित बाजार के अवसरों से जोड़ा जाए।
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