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श्रीनगर जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने झेलम नदी में हो रही खनन गतिविधियों, प्रस्तावित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) लगाने की योजना, और बाढ़ नियंत्रण के लिए तटबंधों (embankments) के निर्माण या उन्हें हटाने के संबंध में एक रिपोर्ट मांगी है। मुख्य न्यायाधीश डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और न्यायमूर्ति यश पॉल बोर्नी की खंडपीठ ने यह रिपोर्ट तब मांगी, जब 'एनवायर्नमेंटल पॉलिसी ग्रुप' द्वारा झेलम नदी के संरक्षण के लिए दायर जनहित याचिका (PIL) में 'एमिकस क्यूरी' (अदालत के सहयोगी) के रूप में काम कर रहे वकील नदीम कादिरी ने ये मुद्दे उठाए।
'एमिकस क्यूरी' ने शुरुआत में ही पूछा, "पूरी झेलम नदी में किस तरह की कानूनी या अवैध खनन गतिविधियां चल रही हैं? झेलम नदी के बहाव क्षेत्र में कितने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) लगाने का प्रस्ताव है? और बाढ़ को रोकने के लिए कितने तटबंध बनाए गए हैं या हटाए गए हैं?" अदालत में वकील की इन बातों के बाद, सरकार की ओर से वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता (Senior AAG) ने अदालत को बताया कि वह इन सभी मुद्दों पर जवाब देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वे 25 अक्टूबर को संभागीय आयुक्त (Divisional Commissioner) द्वारा दायर हलफनामे के क्रियान्वयन के बारे में भी जानकारी देंगे।
हालांकि, अदालत ने वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता को यह भी बताने का निर्देश दिया कि बाढ़ को कम करने (flood mitigation) से जुड़े मामलों में अब तक क्या-क्या प्रगति हुई है। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 31 अक्टूबर की तारीख तय की है। 2017 में दायर की गई यह जनहित याचिका कश्मीर की कमजोर बाढ़ प्रबंधन प्रणाली की ओर ध्यान दिलाती है। इसमें कश्मीर को भविष्य में आने वाली बाढ़ जैसी आपदाओं से बचाने के लिए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई है। यह जनहित याचिका बाढ़ प्रबंधन में मौजूद उन कमियों को भी उजागर करती है, जिनके कारण 2014 की बाढ़ में भारी नुकसान हुआ था। साथ ही, इसमें भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की गई है।
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