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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में बिजली की दरों में 1 सितंबर से हुई 6.83 प्रतिशत की बढ़ोतरी ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार के सामने एक नया राजनीतिक मोर्चा खोल दिया है। बढ़ती बिजली दरों का असर सीधे आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने की आशंका के बीच विपक्ष ने सरकार को घेरने की तैयारी शुरू कर दी है। खास बात यह है कि यह फैसला ऐसे समय में आया है जब उमर सरकार को अपनी ही पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के भीतर से भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी को केवल आर्थिक फैसला नहीं माना जा रहा है। जम्मू-कश्मीर में बिजली का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है। सरकारों ने सब्सिडी और अन्य उपायों के जरिए बिजली की लागत को अपेक्षाकृत कम रखने की कोशिश की है। इसके कारण उपभोक्ताओं के बीच यह धारणा बनी रही है कि जम्मू-कश्मीर में बिजली अपेक्षाकृत सस्ती रहनी चाहिए।
ऐसे में दरों में 6.83 प्रतिशत की वृद्धि ने सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बढ़ा दी है।
200 यूनिट मुफ्त बिजली के वादे की याद
इस फैसले को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए सबसे बड़ी परेशानी उसके 2024 के चुनावी वादे से जुड़ी है। पार्टी ने विधानसभा चुनाव के दौरान 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने का वादा किया था। बिजली दरों में बढ़ोतरी के बाद विपक्ष इस वादे को लेकर सरकार पर सवाल उठा सकता है।
राजनीतिक विरोधियों के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बिजली हर परिवार की रोजमर्रा की जरूरत है। पेट्रोल, गैस या अन्य वस्तुओं की तरह बिजली की कीमत में बदलाव का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ता है। खासकर मध्यम वर्ग और सीमित आय वाले परिवारों के लिए बिल में बढ़ोतरी चिंता का विषय बन सकती है।
विपक्ष अब यह सवाल उठा सकता है कि जिस सरकार ने मुफ्त बिजली का वादा किया था, उसके कार्यकाल में बिजली महंगी क्यों हो रही है।
बिजली को लेकर जम्मू-कश्मीर की अलग राजनीतिक संवेदनशीलता
देश के अन्य हिस्सों में बिजली दरों में बदलाव सामान्य नियामकीय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में इसका राजनीतिक प्रभाव अधिक गहरा माना जाता है। यहां लंबे समय से बिजली आपूर्ति और कीमतों को लेकर जनता की अपेक्षाएं बनी रही हैं।
राज्य की पिछली सरकारों ने सब्सिडी और सरकारी सहायता के जरिए उपभोक्ताओं पर बिजली की वास्तविक लागत का पूरा भार पड़ने से रोकने की कोशिश की। इससे लोगों में सस्ती बिजली की उम्मीद मजबूत हुई।
दूसरी ओर, बिजली क्षेत्र की वित्तीय स्थिति, उत्पादन लागत और आपूर्ति से जुड़े खर्च को देखते हुए दरों में बदलाव की जरूरत भी सामने आती रही है। सरकार के सामने चुनौती यह है कि बिजली क्षेत्र की आर्थिक जरूरतों और उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले बोझ के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
उमर सरकार के सामने दोहरी चुनौती
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के लिए यह मुद्दा इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि उनकी सरकार को पहले से कई राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर से उठ रही आलोचना और राज्य का दर्जा बहाल कराने के अभियान को लेकर राजनीतिक सवालों के बीच बिजली दरों में वृद्धि ने विपक्ष को एक ऐसा मुद्दा दे दिया है जिसे सीधे आम जनता से जोड़ा जा सकता है।
राज्य का दर्जा बहाल करना उमर सरकार के प्रमुख राजनीतिक एजेंडों में रहा है। लेकिन आम लोगों के लिए रोजमर्रा की समस्याएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। बिजली के बिल में बढ़ोतरी जैसे मुद्दे सरकार के प्रदर्शन को लेकर जनता की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं।
विपक्ष के लिए आसान राजनीतिक मुद्दा
बिजली की कीमत का मुद्दा विपक्ष के लिए अपेक्षाकृत आसान राजनीतिक हथियार माना जाता है, क्योंकि इसका असर सीधे उपभोक्ताओं पर दिखाई देता है। विपक्ष सरकार से यह पूछ सकता है कि क्या बढ़ोतरी को टाला नहीं जा सकता था और क्या आम लोगों को राहत देने के लिए अतिरिक्त सब्सिडी का रास्ता अपनाया जा सकता था।
विपक्षी दल बिजली की दरों में बढ़ोतरी को सरकार के चुनावी वादों से जोड़कर भी सवाल उठा सकते हैं। खासकर 200 यूनिट मुफ्त बिजली के वादे के संदर्भ में सरकार को अपनी नीति स्पष्ट करनी पड़ सकती है।
सरकार के सामने आर्थिक मजबूरियां भी
हालांकि, बिजली दरों में बढ़ोतरी को केवल राजनीतिक नजरिए से देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। बिजली की खरीद, उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण पर होने वाला खर्च लगातार वित्तीय दबाव पैदा करता है। यदि बिजली की वास्तविक लागत और उपभोक्ताओं से वसूली जाने वाली राशि के बीच बड़ा अंतर हो तो सरकार को सब्सिडी का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ता है।
जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्र में बिजली की मांग और आपूर्ति का संतुलन भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। सर्दियों में बिजली की मांग बढ़ने और कई इलाकों में मौसम संबंधी परिस्थितियों के कारण आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
ऐसे में सरकार को एक ओर बिजली क्षेत्र को वित्तीय रूप से टिकाऊ बनाए रखना है, तो दूसरी ओर उपभोक्ताओं को महंगाई से बचाना भी जरूरी है।
ग्रामीण और मध्यम वर्ग पर नजर
दर वृद्धि का असर अलग-अलग उपभोक्ता वर्गों पर अलग हो सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे कारोबारियों और सीमित आय वाले परिवारों के लिए बिजली बिल में अतिरिक्त राशि महत्वपूर्ण हो सकती है। वहीं, अधिक खपत वाले शहरी उपभोक्ताओं पर भी बढ़ोतरी का असर अपेक्षाकृत अधिक दिखाई दे सकता है।
सरकार के लिए यह बताना महत्वपूर्ण होगा कि 6.83 प्रतिशत की बढ़ोतरी से अलग-अलग श्रेणी के उपभोक्ताओं के मासिक बिल में कितना बदलाव आएगा और क्या किसी वर्ग को अतिरिक्त राहत दी जाएगी।
आने वाले दिनों में बढ़ सकती है राजनीतिक गर्मी
फिलहाल बिजली दरों में बढ़ोतरी ने उमर सरकार के सामने आर्थिक और राजनीतिक दोनों तरह की चुनौती खड़ी कर दी है। सरकार को जहां बिजली क्षेत्र की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए कदम उठाने होंगे, वहीं जनता और विपक्ष की नाराजगी को भी संभालना होगा।
नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए सबसे बड़ा सवाल उसके 2024 के चुनावी वादे और मौजूदा बिजली नीति के बीच संतुलन का है। यदि सरकार मुफ्त बिजली के वादे को लागू करने के साथ बढ़ी हुई दरों का बोझ भी संभालती है, तो उसे इसके लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन जुटाने होंगे।
ऐसे में 1 सितंबर से लागू हुई 6.83 प्रतिशत बढ़ोतरी आने वाले दिनों में जम्मू-कश्मीर की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकती है। उमर अब्दुल्ला सरकार को अब यह साबित करना होगा कि बिजली क्षेत्र की आर्थिक मजबूरियों और आम उपभोक्ताओं की उम्मीदों के बीच वह किस तरह संतुलन कायम करती है।





