जम्मू और कश्मीर

Dr. Karwani ने सांस्कृतिक जागरूकता और विरासत संरक्षण की अपील की

Payal
28 April 2026 7:29 PM IST
Dr. Karwani ने सांस्कृतिक जागरूकता और विरासत संरक्षण की अपील की
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Jammu.जम्मू: जम्मू-कश्मीर के प्रतिष्ठित विद्वान डॉ. करवानी ने हाल ही में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में संस्कृति, विरासत और पारंपरिक संस्कारों के संरक्षण की वकालत की। उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवनशैली और वैश्वीकरण के दौर में हमारी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं को बचाना आज की सबसे बड़ी चुनौती है।
डॉ. करवानी ने अपने भाषण में जोर दिया कि किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति, विरासत और संस्कारों में छिपी होती है। उन्होंने कहा, “हमारी विरासत केवल पुरानी इमारतों या कलाकृतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारी परंपराएं, रीति-रिवाज, भाषा और नैतिक मूल्यों में भी निहित है। इन्हें संरक्षित करना हम सभी का कर्तव्य है।”
उन्होंने युवाओं को विशेष रूप से संदेश दिया कि वे अपनी जड़ों और परंपराओं के प्रति जागरूक रहें। उनका मानना है कि युवा पीढ़ी को अपनी संस्कृति और विरासत की समझ होना आवश्यक है ताकि आने वाले समय में समाज अपनी पहचान और मूल्यों को बनाए रख सके।
कार्यक्रम में डॉ. करवानी ने कला, संगीत, नृत्य और साहित्य जैसे विभिन्न सांस्कृतिक पहलुओं को संरक्षित करने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि ये केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि हमारी सामाजिक और नैतिक शिक्षा का हिस्सा हैं।
डॉ. करवानी ने प्रशासन और समाज के अन्य हिस्सों से भी अपील की कि वे सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए नीतियां और कार्यक्रम लागू करें। उन्होंने कहा कि सरकारी स्तर पर संरक्षण के प्रयासों के साथ-साथ नागरिकों का व्यक्तिगत योगदान भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम में उपस्थित दर्शकों और विद्वानों ने डॉ. करवानी के विचारों का स्वागत किया और कहा कि यह संदेश समाज में जागरूकता बढ़ाने और सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कार्यक्रम समाज में सांस्कृतिक संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं और युवाओं को अपनी विरासत के प्रति जिम्मेदार बनाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक तकनीक और मीडिया का उपयोग कर संस्कृति और संस्कारों को लोगों तक अधिक प्रभावशाली ढंग से पहुंचाया जा सकता है।
डॉ. करवानी के अनुसार, केवल स्मारक और ऐतिहासिक स्थल ही नहीं, बल्कि भाषा, पर्व, रीति-रिवाज और सामाजिक मान्यताएं भी हमारी असली विरासत हैं। उनका संदेश स्पष्ट था: यदि हम अपनी संस्कृति, विरासत और संस्कारों की रक्षा नहीं करेंगे, तो हमारी आने वाली पीढ़ियां अपनी पहचान खो सकती हैं।
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