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जम्मू-कश्मीर में भूकंप का खतरा, श्रीनगर के घनी आबादी वाले इलाके ज्यादा संवेदनशील

श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में भूकंप के जोखिम को कम करने के लिए व्यापक रणनीति तैयार करने की दिशा में काम जारी है। वैज्ञानिक अध्ययनों में श्रीनगर के ऐसे इलाकों की पहचान की गई है, जहां घनी आबादी, बड़ी संख्या में निर्माण, संकरी सड़कें और खुली जगहों की कमी भूकंप की स्थिति में नुकसान के जोखिम को बढ़ा सकती है। भूकंप के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र में स्थित होने के कारण जम्मू-कश्मीर में आपदा प्रबंधन और सुरक्षित निर्माण व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
श्रीनगर में तेजी से हुए शहरी विस्तार के कारण कई इलाकों में आबादी और इमारतों का घनत्व काफी अधिक है। ऐसे क्षेत्रों में भूकंप जैसी आपदा आने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने, राहत एवं बचाव दलों की आवाजाही और घायलों तक समय पर मदद पहुंचाने में मुश्किल हो सकती है।
वैज्ञानिक अध्ययनों में खासतौर पर उन इलाकों को लेकर चिंता जताई गई है, जहां सड़कें संकरी हैं। भूकंप के दौरान यदि इमारतें क्षतिग्रस्त होती हैं और उनका मलबा सड़कों पर गिरता है तो राहत एवं बचाव वाहनों के लिए प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है।
इसके अलावा खुली जगहों की कमी भी बड़ी चुनौती मानी जा रही है। किसी बड़े भूकंप के बाद लोगों को सुरक्षित स्थानों पर एकत्र करने के लिए पर्याप्त खुले क्षेत्र जरूरी होते हैं। घनी आबादी वाले इलाकों में ऐसे स्थान सीमित होने से आपदा के समय लोगों को सुरक्षित रखने की चुनौती बढ़ सकती है।
जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक स्थिति भी भूकंप के जोखिम को महत्वपूर्ण बनाती है। हिमालयी क्षेत्र में होने वाली भूगर्भीय गतिविधियों के कारण इस पूरे इलाके को भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। यही कारण है कि यहां केवल भूकंप आने के बाद राहत और बचाव पर निर्भर रहने के बजाय पहले से जोखिम कम करने की योजना तैयार करना जरूरी है।
भूकंप के जोखिम को कम करने की रणनीति में सुरक्षित निर्माण, पुरानी इमारतों की स्थिति, आपातकालीन रास्ते, खुले स्थानों की उपलब्धता और लोगों की जागरूकता जैसे कई पहलुओं की भूमिका होती है। विशेष रूप से घनी आबादी वाले शहरों में इन सभी पहलुओं को एक साथ ध्यान में रखना जरूरी है।
श्रीनगर के कई हिस्सों में पुराने और नए निर्माण एक साथ मौजूद हैं। ऐसे में इमारतों की संरचनात्मक मजबूती का आकलन भी महत्वपूर्ण हो जाता है। भूकंप के दौरान सबसे ज्यादा खतरा उन निर्माणों को हो सकता है जो तेज झटकों को सहने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं हैं।
आपदा प्रबंधन की दृष्टि से केवल इमारतों की मजबूती ही पर्याप्त नहीं है। प्रभावित लोगों तक राहत पहुंचाने के लिए सड़क नेटवर्क, अस्पतालों की उपलब्धता, संचार व्यवस्था और आपातकालीन सेवाओं की तैयारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
भूकंप के दौरान बिजली, संचार और परिवहन जैसी आवश्यक सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। ऐसे में वैकल्पिक व्यवस्था और पहले से तैयार आपदा प्रतिक्रिया योजना नुकसान को कम करने में मदद कर सकती है।
श्रीनगर जैसे घनी आबादी वाले शहर में राहत एवं बचाव की योजना बनाते समय स्थानीय स्तर पर मौजूद चुनौतियों को ध्यान में रखना जरूरी है। संकरी गलियां, घनी बस्तियां और सीमित खुले स्थान आपदा के दौरान सामान्य परिस्थितियों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर समस्या बन सकते हैं।
इस मुद्दे का महत्व केवल जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं है। देश के बड़े हिस्से में भूकंप का जोखिम मौजूद है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट के अनुसार भारत का लगभग 59 प्रतिशत भूभाग अलग-अलग स्तर पर भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील है।
इन आंकड़ों के अनुसार देश का करीब 11 प्रतिशत क्षेत्र सबसे अधिक जोखिम वाले भूकंपीय जोन V में आता है। इसके अलावा करीब 18 प्रतिशत क्षेत्र जोन IV में शामिल है। इससे स्पष्ट होता है कि देश के एक बड़े हिस्से में भूकंप से जुड़े जोखिम को ध्यान में रखते हुए तैयारी की आवश्यकता है।
जोन V में शामिल क्षेत्रों को भूकंप के लिहाज से सबसे अधिक संवेदनशील माना जाता है। वहीं जोन IV में भी भूकंप से गंभीर नुकसान की संभावना को देखते हुए मजबूत निर्माण मानकों और आपदा प्रबंधन व्यवस्था की जरूरत रहती है।
भारत में भूकंप का खतरा अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में अलग स्तर का है। हिमालयी क्षेत्र में इसकी संवेदनशीलता विशेष रूप से अधिक मानी जाती है। जम्मू-कश्मीर की स्थिति को इसी व्यापक भूकंपीय जोखिम के संदर्भ में देखा जाता है।
भूकंप की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके आने का सटीक समय पहले से तय नहीं किया जा सकता। इसलिए जोखिम कम करने की रणनीति का मुख्य आधार तैयारी, सुरक्षित निर्माण और तेज आपदा प्रतिक्रिया होती है।
घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में इमारतों की संरचनात्मक सुरक्षा की नियमित समीक्षा महत्वपूर्ण हो सकती है। इसके साथ नए निर्माण में भूकंपरोधी मानकों का पालन और पुरानी इमारतों की मजबूती का आकलन भी जोखिम कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
खुली जगहों की पहचान भी आपदा प्रबंधन योजना का हिस्सा हो सकती है। भूकंप के बाद प्रभावित लोगों को अस्थायी रूप से सुरक्षित रखने, चिकित्सा सहायता देने और राहत सामग्री वितरित करने के लिए ऐसे स्थान उपयोगी होते हैं।
इसी तरह आपातकालीन मार्गों की पहचान पहले से होना जरूरी है। संकरी सड़कों वाले क्षेत्रों में वैकल्पिक रास्तों की योजना नहीं होने पर बड़े भूकंप के बाद राहत कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
स्थानीय लोगों को भी भूकंप के दौरान अपनाए जाने वाले सुरक्षा उपायों की जानकारी होना जरूरी है। स्कूलों, कार्यालयों, अस्पतालों और सार्वजनिक संस्थानों में नियमित अभ्यास लोगों को आपदा के दौरान सही प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार कर सकता है।
जम्मू-कश्मीर में तैयार की जा रही व्यापक रणनीति के सामने श्रीनगर की शहरी संरचना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। घनी आबादी और सीमित खुले क्षेत्रों वाले इलाकों में जोखिम कम करने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार योजनाएं तैयार करना आवश्यक होगा।
भारत के करीब 59 प्रतिशत भूभाग के भूकंप के प्रति संवेदनशील होने के आंकड़े इस विषय को राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण बनाते हैं। विशेष रूप से जोन IV और जोन V में आने वाले क्षेत्रों में निर्माण सुरक्षा और आपदा तैयारी पर लगातार ध्यान देने की जरूरत है।
फिलहाल जम्मू-कश्मीर में भूकंप के जोखिम को कम करने के लिए व्यापक रणनीति पर काम जारी है। वैज्ञानिक अध्ययनों में सामने आए संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान भविष्य की योजना बनाने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। श्रीनगर में घनी आबादी, संकरी सड़कें और खुले स्थानों की कमी जैसी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए प्रभावी तैयारी ही किसी बड़े भूकंप की स्थिति में नुकसान कम करने का प्रमुख आधार बन सकती है।





