जम्मू और कश्मीर

Hoshiarpur का भूंगा सिट्रस एस्टेट बन गया फलों की खेती का उदाहरण

Ratna Netam
6 May 2026 5:47 PM IST
Hoshiarpur का भूंगा सिट्रस एस्टेट बन गया फलों की खेती का उदाहरण
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Jalandhar.जालंधर: होशियारपुर जिले के भूंगा सिट्रस एस्टेट ने फलों की खेती में मॉडल हब के तौर पर अपनी पहचान बनाई है। इस एस्टेट ने स्थानीय किसानों की आय बढ़ाने और क्षेत्र में कृषि व्यवसाय को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भूंगा सिट्रस एस्टेट में विभिन्न प्रकार के खट्टे और मीठे फल उगाए जा रहे हैं, जिसमें संतरा, मौसंबी और नींबू प्रमुख हैं। आधुनिक कृषि तकनीक और वैज्ञानिक खेती के तरीकों को अपनाने से फसल की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
एस्टेट प्रबंधकों ने बताया कि किसानों को प्रशिक्षण और आधुनिक कृषि उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इससे न केवल उत्पादन बढ़ा है, बल्कि किसानों को बाजार में बेहतर मूल्य भी मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस मॉडल के जरिए किसानों को कृषि व्यवसाय में आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला है।
किसानों ने बताया कि पहले उन्हें फलोत्पादन के लिए सीमित जानकारी और संसाधन उपलब्ध थे, लेकिन भूंगा सिट्रस एस्टेट के आने के बाद उनकी खेती की गुणवत्ता और आमदनी दोनों में सुधार हुआ है। एक किसान ने कहा, “अब हमारी फसलें अधिक टिकाऊ और बाजार में अधिक मूल्यवान हो गई हैं। इससे हमारी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है।”
स्थानीय कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि भूंगा सिट्रस एस्टेट का मॉडल अन्य ग्रामीण इलाकों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने बताया कि इस प्रकार के हब किसानों को नई तकनीक, बेहतर बीज और सिंचाई के आधुनिक तरीकों से जोड़ते हैं, जिससे खेती में नवाचार और उत्पादन दोनों बढ़ते हैं।
एस्टेट में खेती के अलावा, किसानों को फसल विपणन और ब्रांडिंग के बारे में भी मार्गदर्शन दिया जा रहा है। इससे उन्हें अपने उत्पाद सीधे बाजार में बेचने और बेहतर मूल्य प्राप्त करने का अवसर मिल रहा है।
स्थानीय प्रशासन ने भी इस पहल की सराहना की है। उन्होंने कहा कि भूंगा सिट्रस एस्टेट के माध्यम से किसानों को वित्तीय स्थिरता और कृषि व्यवसाय में नई संभावनाओं के रास्ते मिल रहे हैं। प्रशासन ने आगे कहा कि ऐसे मॉडल हब पूरे जिले में फैलाए जाने चाहिए ताकि अधिक से अधिक किसान लाभान्वित हो सकें।
भूंगा सिट्रस एस्टेट ने यह भी सुनिश्चित किया है कि खेती पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ तरीकों से हो। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के कम उपयोग, जैविक खेती और जल संरक्षण के उपाय किसानों को सिखाए जा रहे हैं।
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