जम्मू और कश्मीर

सेब की घाटी में अंगूरों का गांव, रेपोरा की खेती ने बनाई अलग पहचान

nidhi
16 Oct 2026 7:41 AM IST
सेब की घाटी में अंगूरों का गांव, रेपोरा की खेती ने बनाई अलग पहचान
x
जानिए कश्मीर के रेपोरा गांव की कहानी
श्रीनगर: कश्मीर की पहचान सेब, केसर और अखरोट से जुड़ी रही है, लेकिन गांदरबल जिले का रेपोरा गांव अंगूर की खेती के लिए जाना जाता है। बेलों पर लटकते अंगूरों के गुच्छे और पीढ़ियों से इस काम में जुटे परिवार इसकी अलग पहचान हैं। स्थानीय किसानों के मुताबिक, गांव की करीब 90 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अंगूर की खेती से जुड़ी है। उपलब्ध जानकारी में यह आंकड़ा गांव की आबादी से संबंधित है; पूरे कश्मीर के 90 प्रतिशत अंगूर इसी गांव में पैदा होने की पुष्टि नहीं होती।
श्रीनगर से लगभग 30 किलोमीटर उत्तर में स्थित रेपोरा को ‘अंगूरों वाला गांव’ कहा जाता है। यहां खेती केवल फल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय परिवारों की आजीविका और गांव की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है। फसल तैयार होने पर बागों की देखभाल, तुड़ाई, छंटाई और बाजार तक पहुंचाने के काम में लोगों की भागीदारी बढ़ जाती है। अंगूर इस क्षेत्र में किसानों की आय का महत्वपूर्ण आधार हैं।
रेपोरा के अंगूरों की चर्चा उनके आकार, स्वाद और गुणवत्ता के कारण होती है। इसी आधार पर उनकी तुलना इटली के अंगूरों से भी की जाती रही है। हालांकि, इसे किसी औपचारिक वैश्विक रैंकिंग के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। स्थानीय किसानों ने कुछ अंगूरों का वजन 14 से 15 ग्राम तक होने का दावा किया है। यहां साहिबी, हुसैनी और थॉमसन सीडलेस जैसी किस्में उगाई जाती हैं।
इस गांव का अंगूरों से रिश्ता पुराना बताया जाता है। स्थानीय इतिहास और परंपराओं में रेपोरा के अंगूरों का उल्लेख मिलता है। सूफी संत शेख नूरुद्दीन वली से जुड़ी एक पंक्ति में भी यहां के अंगूरों की प्रशंसा का उल्लेख किया जाता है। किसानों के लिए यह विरासत उनकी खेती के प्रति जुड़ाव का हिस्सा है। यहां कई परिवारों ने अपने बुजुर्गों से बेलों की देखभाल और फल तैयार करने का अनुभव हासिल किया है।
अच्छी फसल के लिए बेलों की नियमित देखभाल जरूरी होती है। रेपोरा में कुछ बागवान पुराने तरीकों के साथ आधुनिक व्यवस्थाएं भी अपना रहे हैं। बेलों को सहारा देने के लिए ट्रेलिस प्रणाली और फसल की सुरक्षा के लिए जाल का इस्तेमाल इसके उदाहरण हैं। किसानों के सामने मौसम और फलों को नुकसान पहुंचाने वाले जीवों से बचाव की चुनौती भी रहती है। बारिश के कारण फल की गुणवत्ता प्रभावित होने की चिंता स्थानीय बागवान जताते रहे हैं।
गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के बावजूद बाजार तक पहुंच एक महत्वपूर्ण विषय है। गांव के अंगूर मुख्य रूप से स्थानीय और आसपास के बाजारों में बेचे जाते रहे हैं। उत्पादन, सुरक्षित पैकिंग और बिक्री की व्यवस्था किसानों की कमाई को प्रभावित करती है। बाग से फल तोड़ने के बाद उसे सावधानी से संभालना जरूरी होता है, ताकि गुच्छों को नुकसान न पहुंचे और उनकी गुणवत्ता बनी रहे।
कश्मीर में अंगूर की खेती को वैज्ञानिक सहयोग देने के प्रयास भी हुए हैं। अप्रैल 2025 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय अंगूर अनुसंधान केंद्र की टीम ने गांदरबल और बारामुला में बागानों का निरीक्षण किया था। संस्थान और कश्मीर संभाग के बागवानी विभाग के बीच सहयोग के लिए समझौता भी हुआ। इसका उद्देश्य गैर-परंपरागत क्षेत्रों में अंगूर की खेती को बढ़ावा देना और उपलब्ध रोपण सामग्री की प्रगति का आकलन करना था।
Next Story