हिमाचल प्रदेश

हिमाचल की 3 धरोहरों को GI टैग रणसिंघा गलीचा और नक्काशी को मिली पहचान

nidhi
27 Aug 2026 7:26 AM IST
हिमाचल की 3 धरोहरों को GI टैग रणसिंघा गलीचा और नक्काशी को मिली पहचान
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तीन पारंपरिक उत्पादों को GI मान्यता

शिमला: हिमाचल प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को बड़ी पहचान मिली है। राज्य की तीन पारंपरिक धरोहरों—रणसिंघा, हस्तनिर्मित गलीचा और हिमाचली काष्ठ नक्काशी शिल्प को भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग प्रदान किया गया है। इस उपलब्धि से इन पारंपरिक कलाओं को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी नई पहचान मिलने की उम्मीद है। GI टैग मिलने के बाद इन उत्पादों की असली पहचान सुरक्षित होगी और इनके नाम का गलत इस्तेमाल या नकली उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे स्थानीय कारीगरों और शिल्पकारों को बेहतर बाजार, उचित मूल्य और रोजगार के नए अवसर मिल सकते हैं।

रणसिंघा ने दिखाई हिमाचल की सांस्कृतिक ताकत
रणसिंघा हिमाचल प्रदेश का एक पारंपरिक धातु वाद्य यंत्र है, जिसका इस्तेमाल धार्मिक आयोजनों, मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लंबे समय से किया जाता रहा है। इसकी विशेष ध्वनि और पारंपरिक निर्माण तकनीक इसे हिमाचल की लोक संस्कृति का अहम हिस्सा बनाती है। GI टैग मिलने से रणसिंघा बनाने वाले कारीगरों को नई पहचान मिलेगी और आने वाली पीढ़ियां भी इस कला से जुड़ सकेंगी।
हस्तनिर्मित गलीचा को मिलेगा बड़ा बाजार
हिमाचली हस्तनिर्मित गलीचा अपनी बुनाई, डिजाइन और पारंपरिक कला के लिए जाना जाता है। यह राज्य की पुरानी बुनाई परंपरा को दर्शाता है और कई परिवारों की आजीविका का साधन भी है। GI टैग मिलने से इन गलीचों की मांग देश-विदेश के बाजारों में बढ़ने की संभावना है। कारीगरों को उम्मीद है कि वैश्विक बाजार में पहचान मिलने के बाद उनके उत्पादों की बिक्री बढ़ेगी और उन्हें अपनी मेहनत का बेहतर मूल्य मिलेगा।
काष्ठ नक्काशी को मिली नई पहचान
हिमाचली काष्ठ नक्काशी शिल्प अपनी बारीक डिजाइन और पारंपरिक तकनीक के लिए प्रसिद्ध है। मंदिरों, पुराने भवनों और घरों में लकड़ी पर की गई नक्काशी हिमाचल की स्थापत्य कला की पहचान रही है। GI टैग मिलने से इस कला को संरक्षण मिलेगा और लकड़ी के शिल्प से जुड़े कलाकारों को प्रोत्साहन मिलेगा।
कारीगरों की आय बढ़ने की उम्मीद
GI टैग किसी भी क्षेत्रीय उत्पाद को विशेष पहचान देता है। इससे ग्राहकों को असली उत्पाद की पहचान करने में आसानी होती है और स्थानीय उत्पादकों को बड़े बाजारों तक पहुंच मिलती है। हिमाचल प्रदेश में पहले से ही कई उत्पादों को GI टैग मिल चुका है, जिनमें कुल्लू शॉल, किन्नौरी शॉल, कांगड़ा चाय और चंबा रुमाल जैसे प्रसिद्ध उत्पाद शामिल हैं। नई तीन धरोहरों के जुड़ने से राज्य की सांस्कृतिक पहचान और मजबूत हुई है। राज्य के कारीगरों और संगठनों का मानना है कि यह कदम हिमाचल की सदियों पुरानी कला और परंपराओं को दुनिया तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
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