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मनाली में रूसी हर्बलिस्ट और भारतीय आर्किटेक्ट का अनोखा प्राकृतिक जीवन

मनाली। समुद्र तल से करीब 2,200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मनाली की शांत पहाड़ियों में आधुनिक जीवनशैली से बिल्कुल अलग जीवन जीने का एक अनोखा प्रयोग पिछले सात वर्षों से जारी है। चीड़ के जंगलों से घिरे सेब के बगीचे में बने एक पुराने घर को रूसी हर्बलिस्ट ओलेना और भारतीय आर्किटेक्ट विश्वेश ने ऐसी जगह में बदल दिया है, जहां जीवन की गति आधुनिक शहरों की तरह तेज नहीं, बल्कि प्रकृति की लय के अनुरूप है।
दोनों ने आधुनिक सभ्यता की सुविधाओं और भागदौड़ से दूरी बनाकर आत्मनिर्भर जीवन का रास्ता चुना है। उनका प्रयास केवल शहर छोड़कर पहाड़ों में बसने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे अपने जीवन को प्रकृति के नियमों के करीब लाने की कोशिश कर रहे हैं।
वाराणसी में हुई थी पहली मुलाकात
ओलेना और विश्वेश की कहानी की शुरुआत जून 2019 में वाराणसी से हुई। पवित्र शहर में हुई एक मुलाकात धीरे-धीरे साझा विचारों और जीवन के प्रति समान दृष्टिकोण में बदल गई।
दोनों का मानना था कि आधुनिक समाज लोगों को जीवन की कई समस्याओं के लिए तैयार समाधान देता है, लेकिन इन समाधानों से आगे भी जीवन को देखने का एक रास्ता हो सकता है। वे ऐसा जीवन चाहते थे जिसमें प्रकृति, स्वास्थ्य, आत्मनिर्भरता और मानसिक शांति को प्राथमिकता मिले।
वाराणसी में मुलाकात के बाद दोनों ने इस विचार को वास्तविक जीवन में आजमाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने पहाड़ी क्षेत्र को चुना, जहां वे अपेक्षाकृत प्राकृतिक वातावरण में रह सकें और अपनी जरूरतों को सीमित रखते हुए जीवन जी सकें।
मनाली में मिला अपना ठिकाना
आखिरकार दोनों मनाली पहुंचे और करीब 2,200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक पुराने घर को अपना ठिकाना बनाया। घर एक सेब के बगीचे के बीच है और इसके आसपास चीड़ के जंगल हैं।
शहरों की भीड़, यातायात और लगातार बढ़ते शोर से दूर यह स्थान उन्हें उस जीवनशैली के लिए उपयुक्त लगा, जिसकी वे तलाश कर रहे थे। पुराने घर और आसपास की प्राकृतिक परिस्थितियों को उन्होंने अपनी जरूरतों के अनुसार ढालने का प्रयास किया।
यहां दिनचर्या मौसम, सूर्योदय, उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों और आसपास के पर्यावरण के साथ जुड़ी हुई है। उनका जीवन आधुनिक समय की लगातार बदलती गति से अलग है।
आत्मनिर्भरता को बनाया आधार
ओलेना और विश्वेश के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आत्मनिर्भरता है। उनका प्रयास है कि रोजमर्रा की जरूरतों के लिए बाहरी दुनिया पर निर्भरता कम से कम हो।
वे प्रकृति से मिलने वाले संसाधनों को समझने और उनका जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने पर जोर देते हैं। हर्बलिस्ट के रूप में ओलेना की रुचि प्राकृतिक पौधों और पारंपरिक ज्ञान में है, जबकि आर्किटेक्ट होने के कारण विश्वेश का ध्यान रहने की जगह और प्राकृतिक वातावरण के बीच संतुलन पर रहता है।
उनका प्रयोग इस विचार पर आधारित है कि मनुष्य को अपनी हर जरूरत के लिए बाजार और आधुनिक व्यवस्था पर निर्भर रहने के बजाय प्रकृति के साथ तालमेल बैठाना सीखना चाहिए।
आधुनिक जीवनशैली से अलग सोच
ओलेना और विश्वेश के लिए पहाड़ों में रहना केवल शहर से दूर जाने का फैसला नहीं है। यह जीवन के बारे में उनके दृष्टिकोण का हिस्सा है। वे मानते हैं कि आधुनिक जीवन में सुविधा बढ़ने के साथ-साथ तनाव, शोर और लगातार प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है।
इसीलिए उन्होंने अपनी प्राथमिकताओं को बदलने का फैसला किया। उनकी जीवनशैली में भौतिक जरूरतों को सीमित करना, प्रकृति के करीब रहना और रोजमर्रा के कामों को अपने हाथों से करना महत्वपूर्ण हिस्सा है।
हालांकि यह रास्ता आसान नहीं है। पहाड़ी क्षेत्र में मौसम का बदलना, सीमित संसाधन, परिवहन की कठिनाइयां और रोजमर्रा की आवश्यकताओं को पूरा करने की चुनौती इस जीवन का हिस्सा हैं। इसके बावजूद दोनों पिछले सात वर्षों से इस प्रयोग को जारी रखे हुए हैं।
प्रकृति के नियमों के साथ जीवन
दोनों की सोच का केंद्र यह है कि जीवन को केवल आधुनिक समाज द्वारा बनाए गए नियमों के आधार पर नहीं, बल्कि प्रकृति की मूल प्रक्रियाओं को समझते हुए भी जिया जा सकता है।
दिन और रात का प्राकृतिक चक्र, मौसम के अनुसार गतिविधियों में बदलाव और स्थानीय संसाधनों की उपलब्धता उनकी जीवनशैली को प्रभावित करते हैं। इस तरह उनका जीवन प्रकृति के साथ लगातार संवाद जैसा बन गया है।
उनके लिए आत्मनिर्भरता का अर्थ पूरी दुनिया से कट जाना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि वास्तविक जरूरतें कितनी हैं और उन्हें पूरा करने के लिए कितने संसाधनों की आवश्यकता है।
पुराने घर से बना जीवन का नया मॉडल
जिस पुराने घर में दोनों रह रहे हैं, वह उनके प्रयोग का केंद्र है। उन्होंने इसे केवल रहने की जगह के रूप में नहीं देखा, बल्कि एक ऐसे स्थान के तौर पर विकसित किया जहां प्राकृतिक जीवन का अभ्यास किया जा सके।
आसपास का सेब का बगीचा और चीड़ का जंगल उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। प्रकृति यहां केवल खूबसूरत दृश्य नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है।
सात साल बाद भी जारी है प्रयोग
जून 2019 में शुरू हुई इस यात्रा को अब सात साल पूरे हो चुके हैं। इतने लंबे समय तक इस तरह की जीवनशैली को जारी रखना अपने आप में एक अनुभव है। इस दौरान दोनों ने यह समझने की कोशिश की है कि आधुनिक सुविधाओं को पूरी तरह छोड़ने के बजाय जरूरत और निर्भरता के बीच संतुलन कैसे बनाया जा सकता है।
उनका जीवन उन लोगों के लिए भी दिलचस्प उदाहरण बन गया है जो शहरों की तेज रफ्तार से अलग प्रकृति के करीब रहना चाहते हैं।
मनाली की ऊंची पहाड़ियों में ओलेना और विश्वेश का यह प्रयोग इस सवाल को सामने रखता है कि विकास और सुविधा के बीच इंसान अपनी प्राकृतिक जरूरतों और मानसिक शांति के लिए कितना स्थान बचा सकता है। उनके लिए इसका जवाब एक पुराने पहाड़ी घर, सेब के बगीचे और चीड़ के जंगलों के बीच सात साल से चल रही जिंदगी में दिखाई देता है।





