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हिमाचल प्रदेश
किन्नौर में बर्फबारी से आफत 2 हजार पशुओं के दबने की आशंका
Ratna Netam
30 Sept 2026 5:33 PM IST

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शिमला। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के ऊंचाई वाले इलाकों में अचानक हुई भारी बर्फबारी से पशुपालकों को बड़ा नुकसान होने की आशंका है। रूपिन दर्रे के आसपास करीब 2,000 भेड़ और बकरियां बर्फ के नीचे दबे होने की आशंका जताई गई है। राजस्व, बागवानी एवं जनजातीय विकास मंत्री जगत सिंह नेगी ने बुधवार को बताया कि स्थिति का जायजा लेने के लिए गठित बचाव दल प्रभावित क्षेत्र तक पहुंच चुका है। फिलहाल पशुओं के वास्तविक नुकसान का आंकड़ा सामने नहीं आया है।
जगत सिंह नेगी के मुताबिक 27 सितंबर को किन्नौर के ऊंचे क्षेत्रों में अचानक तेज बर्फबारी शुरू हुई थी। उस समय स्थानीय चरवाहे अपने भेड़-बकरियों के झुंड के साथ रूपिन दर्रे को पार कर सर्दियों के चरागाहों की ओर जा रहे थे। मौसम के अचानक बदलने और भारी बर्फ गिरने के कारण कई पशु आगे नहीं बढ़ सके और उनके बर्फ में दबने की आशंका है।
मंत्री ने बताया कि प्रभावित इलाके में अभी भी तीन फीट से ज्यादा बर्फ जमा है। इतनी मोटी बर्फ होने के कारण पशुओं की सही संख्या का पता लगाना मुश्किल हो रहा है। बचाव टीम के साथ मौजूद स्थानीय चरवाहों के शुरुआती अनुमान के अनुसार करीब 2,000 भेड़ और बकरियां बर्फ के नीचे हो सकती हैं। हालांकि सरकार ने साफ किया है कि यह संख्या फिलहाल शुरुआती अनुमान है और बर्फ कम होने के बाद ही वास्तविक स्थिति सामने आएगी।
राहत की बात यह है कि अब तक किसी व्यक्ति की मौत की सूचना नहीं है। झुंड के साथ मौजूद चरवाहों में से कई लोग कम बर्फ वाले निचले इलाकों तक पहुंचने में सफल रहे। कुछ चरवाहों ने मौसम खराब होते ही वापस लौटने का फैसला किया, जबकि जो लोग पहले ही दर्रा पार कर चुके थे उनके लिए तुरंत लौटना मुश्किल हो गया था।
भारी बर्फबारी के बाद शुरुआती दो दिनों तक मौसम बेहद खराब रहा, जिसके कारण प्रशासन की टीम प्रभावित स्थान तक नहीं पहुंच पा रही थी। मौसम में सुधार होने के बाद बचाव अभियान तेज किया गया और बुधवार को टीम रूपिन दर्रे के ऊपरी हिस्से तक पहुंच गई। टीम ने सैटेलाइट फोन के जरिए मंत्री और प्रशासन से संपर्क स्थापित किया।
बचाव दल में स्थानीय चरवाहों और स्वयंसेवकों के साथ होमगार्ड, पुलिस और राजस्व विभाग के कर्मचारी शामिल किए गए हैं। इनमें पटवारी और कानूनगो भी मौजूद हैं। इनका मुख्य काम बर्फबारी से प्रभावित इलाके की स्थिति देखना, पशुओं की संख्या का आकलन करना और चरवाहों को जरूरी सहायता पहुंचाना है।
मौके पर पहुंची टीम को बर्फ के बीच कुछ बड़े पशु दिखाई दिए हैं। बताया गया कि सींग वाले कुछ बड़े जानवरों के हिस्से बर्फ से बाहर नजर आ रहे हैं, लेकिन छोटी भेड़ और बकरियां पूरी तरह बर्फ में दब गई हैं। इसी कारण अभी यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि कितने पशुओं की मौत हुई है और कितनों को बचाया जा सकता है।
प्रशासन अब एक और टीम प्रभावित क्षेत्र में भेजने की तैयारी कर रहा है। इसमें पशुपालन विभाग और अन्य संबंधित विभागों के अधिकारियों को शामिल किया जाएगा। दूसरी टीम पशुधन के नुकसान का विस्तृत आकलन करेगी। बर्फ हटने या पिघलने के बाद पशुओं की गिनती करने की योजना है, ताकि नुकसान का वास्तविक आंकड़ा तैयार किया जा सके।
किन्नौर में पिछले कुछ दिनों से मौसम लगातार खराब बना हुआ था। जिले के ऊंचे इलाकों में मौसम की पहली बर्फबारी के बाद तापमान में भी काफी गिरावट दर्ज की गई। छितकुल और कूनो चारंग जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फबारी हुई, जबकि निचले हिस्सों में बारिश दर्ज की गई। कुछ क्षेत्रों में सड़क संपर्क और अन्य सामान्य गतिविधियां भी प्रभावित हुईं।
स्थानीय चरवाहे मौसम के अनुसार अपने पशुओं को एक चरागाह से दूसरे चरागाह तक ले जाते हैं। ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में सर्दियों की शुरुआत से पहले झुंड को निचले या सुरक्षित चरागाहों तक पहुंचाना जरूरी होता है। लेकिन अचानक मौसम खराब होने पर बर्फीले दर्रों से गुजरना बेहद जोखिम भरा हो जाता है। इस बार भी रूपिन दर्रे से गुजरते समय चरवाहों को ऐसी ही मुश्किल परिस्थिति का सामना करना पड़ा।
मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा कि नुकसान का पूरा आकलन होने के बाद प्रभावित पशुपालकों को राहत उपलब्ध कराई जाएगी। सरकार विशेष राहत पैकेज के तहत मदद देने की संभावना पर भी विचार करेगी। हालांकि मुआवजे और सहायता की वास्तविक राशि नुकसान की अंतिम रिपोर्ट आने के बाद तय होगी।
इस घटना ने किन्नौर के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौसम के अचानक बदलने से पैदा होने वाले खतरे को एक बार फिर सामने ला दिया है। तीन फीट से अधिक बर्फ और दुर्गम पहाड़ी परिस्थितियों के बीच राहत दल के सामने भी बड़ी चुनौती है। फिलहाल प्रशासन की प्राथमिकता पशुओं की स्थिति का पता लगाना, प्रभावित चरवाहों तक मदद पहुंचाना और नुकसान का सटीक आकलन करना है।
करीब 2,000 भेड़-बकरियों के दबे होने की आशंका ने पशुपालकों की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि यह आंकड़ा अभी अंतिम नहीं है। बचाव और आकलन अभियान पूरा होने तथा बर्फ कम होने के बाद ही साफ हो सकेगा कि पशुधन को वास्तव में कितना नुकसान पहुंचा है।
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