हिमाचल प्रदेश

Shimla: हिमाचल की धरोहर पांडुलिपियों पर विशेषज्ञों का मंथन

Admindelhi1
21 April 2026 6:56 PM IST
Shimla: हिमाचल की धरोहर पांडुलिपियों पर विशेषज्ञों का मंथन
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शिमला: हिमाचल प्रदेश की प्राचीन लिपियों और पांडुलिपियों को संरक्षित करने को लेकर शिमला में विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों के बीच गहन मंथन शुरू हुआ है। बदलते समय, जलवायु प्रभाव और संरक्षण के अभाव में लुप्त होती इस धरोहर को बचाने के लिए अब संगठित प्रयासों की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।

इसी विषय पर भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला में मंगलवार को दो दिवसीय कार्यशाला शुरू हुई। कार्यशाला में पश्चिमी हिमालय क्षेत्र, विशेषकर हिमाचल प्रदेश में प्रचलित प्राचीन लिपियों और उनसे जुड़ी पांडुलिपि परंपरा के संरक्षण, अध्ययन, डिजिटलीकरण और प्रलेखन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हो रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि शारदा से विकसित पाबुची, टाकरी, पण्डवाणी और चंदवाणी जैसी लिपियाँ आज विलुप्ति के कगार पर हैं। इन लिपियों में संरक्षित पांडुलिपियों में वेद, पुराण, ज्योतिष और आयुर्वेद जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण जानकारी दर्ज है, जो भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के लिए बेहद अहम मानी जाती है।

कार्यक्रम के दौरान पांडुलिपियों की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसमें प्राचीन लेखनकला की दुर्लभ झलक देखने को मिली। कार्यशाला के संयोजक प्रो. ओमप्रकाश शर्मा ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में संरक्षित पांडुलिपियाँ भारतीय ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहर हैं और इनके संरक्षण के लिए संस्थागत स्तर पर ठोस पहल की आवश्यकता है।

बीज वक्ता प्रो. आर.सी. सिन्हा ने अपने संबोधन में पांडुलिपियों की उपयोगिता और उनके संरक्षण के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इनका वैज्ञानिक अध्ययन और व्यवस्थित प्रलेखन समय की मांग है।

मुख्य अतिथि प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि पांडुलिपियाँ केवल ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारतीय बौद्धिक परंपरा की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। उन्होंने इनके संरक्षण के लिए डिजिटलीकरण और आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर बल दिया।

सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. देवदत्त शर्मा ने प्राचीन लिपियों के अध्ययन को भारतीय इतिहास और संस्कृति की समझ के लिए आवश्यक बताते हुए युवा शोधकर्ताओं को इस दिशा में आगे आने के लिए प्रेरित किया।

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